दीवार
जानता जो इतना कि तुम चाहती हो माया को इतना
तो शायद तुम्हे मै कभी न चाहता
चाहता जो मै भी पैसे को तो
शायद तुम्हे कभी भी न अपनाता
हो सकता है कि अपनाना तुम्हे मेरी नादानी थी
हो सकता है कि बननी यूँ ही
मेरी बर्बादी कि कहानी थी
हो सकता है कि यूँ ही मेरी
विकृत तस्वीर जमाने को तुमने दिखानी थी
पर क्या तुम हमेशा के लिए
सच्चाई को छुपा पाओगी
मानता हूँ स्वार्थी है जमाना
पर क्या हमेशा तुम
जमाने के स्वार्थो कि पूर्ति कर पाओगी
पर जानती हो कि
क्या हो सकता है अंजाम इसका
कि एक डोर है उन बीते पलो कि
उड़ रही है सहारे जिसके
पतंग जिन्दगी कि
मगर अब यह डोर भी
हाथ से निकली जा रही है
और ये बेरुखी आपस में
जो आ गयी है बीच में हमारे
अब नफरत कि दीवार सी बनती जा रही है
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
Tuesday, August 24, 2010
अन्धकार (DARKNESS)
अन्धकार
बाहर के अंधे पर क्यों तरस खाता है
पहले अंदर के अंधकार को क्यों नही मिटाता है
बाहर का अँधा तो है मजबूर कि नही दिखाई देता उसको
पर तूं तो देखकर भी सबकुछ फिर भी आँखें मूंदे जाता है
इस पंच भूत के शरीर पर
तो तूं नही करता बर्दाश्त
एक कण भी धूल का
मगर इस आत्मा पर लिपटे इस मैले शरीर पर
तूं क्यों बेतहाशा मुग्ध हुआ जाता है
खुली आँख से तो दीखता है कुछ दूर तक
कुछ अच्छा है कुछ बुरा यह संसार है
मूँद ले आँख और कर ध्यान उस मालिक का
अंदर तेरे छुपा एक पूरा नेसर्गिक ब्रह्मांड है
देख लेगा जो अंदर का संसार एक बार
नही आएगा कभी तरस तुझे
उन बिना आँख के अंधे के अंधकार पर
आयेगा तुझे तरस उन आँखों वालो के
अंदर फैले उस अंधकार पर II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
बाहर के अंधे पर क्यों तरस खाता है
पहले अंदर के अंधकार को क्यों नही मिटाता है
बाहर का अँधा तो है मजबूर कि नही दिखाई देता उसको
पर तूं तो देखकर भी सबकुछ फिर भी आँखें मूंदे जाता है
इस पंच भूत के शरीर पर
तो तूं नही करता बर्दाश्त
एक कण भी धूल का
मगर इस आत्मा पर लिपटे इस मैले शरीर पर
तूं क्यों बेतहाशा मुग्ध हुआ जाता है
खुली आँख से तो दीखता है कुछ दूर तक
कुछ अच्छा है कुछ बुरा यह संसार है
मूँद ले आँख और कर ध्यान उस मालिक का
अंदर तेरे छुपा एक पूरा नेसर्गिक ब्रह्मांड है
देख लेगा जो अंदर का संसार एक बार
नही आएगा कभी तरस तुझे
उन बिना आँख के अंधे के अंधकार पर
आयेगा तुझे तरस उन आँखों वालो के
अंदर फैले उस अंधकार पर II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
ऐसा क्यों है (WHY IT IS SO)
ऐसा क्यों है
जमाने कि हर नई ठोकर
कर देती है मुझको एक
और कदम नजदीक आपके
जमाने कि हरेक बेरुखी
बड़ा देती है और
मेरी चाहत आपमें
जमाने का हरेक धोखा
बड़ा देता है विश्वास
मेरा और भी आपमे
शायद आप भी ये चाहते हो कि
मार मार के ठोकरे जमाना
कर दे कठोर मुझे इतना कि
लगाकर भभूति, जमकर धूनी
मै भी आपकी तरह मस्त हो जाऊ
शायद चाहते हो आप कि
दिखाए जमाना बेरुखी मुझे इतनी कि
मोड़कर मुहं अपना जमाने से
सदा के लिए आप कि
शरण में मै चला आऊं
शायद चाहते हो आप कि
खाऊँ मै जमाने से धोखें इतने कि
सिवा आपके मै दुनिया में
किसी और पर कभी
विश्वास न कर पाऊँ
सच है प्रभु कि आप ही पहला
और आप ही हो आखरी सच
आप ही हो सुंदर सबसे
और आप ही हो शिव
है आप से ये विनती मेरी कि
विश्वास मेरा यूँ ही बनाये रखना
और मुझे अपने चरणों
से लगाये रखना II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
जमाने कि हर नई ठोकर
कर देती है मुझको एक
और कदम नजदीक आपके
जमाने कि हरेक बेरुखी
बड़ा देती है और
मेरी चाहत आपमें
जमाने का हरेक धोखा
बड़ा देता है विश्वास
मेरा और भी आपमे
शायद आप भी ये चाहते हो कि
मार मार के ठोकरे जमाना
कर दे कठोर मुझे इतना कि
लगाकर भभूति, जमकर धूनी
मै भी आपकी तरह मस्त हो जाऊ
शायद चाहते हो आप कि
दिखाए जमाना बेरुखी मुझे इतनी कि
मोड़कर मुहं अपना जमाने से
सदा के लिए आप कि
शरण में मै चला आऊं
शायद चाहते हो आप कि
खाऊँ मै जमाने से धोखें इतने कि
सिवा आपके मै दुनिया में
किसी और पर कभी
विश्वास न कर पाऊँ
सच है प्रभु कि आप ही पहला
और आप ही हो आखरी सच
आप ही हो सुंदर सबसे
और आप ही हो शिव
है आप से ये विनती मेरी कि
विश्वास मेरा यूँ ही बनाये रखना
और मुझे अपने चरणों
से लगाये रखना II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
अनवर्त संघर्ष (CONTINOUS FIGHT)
अनवर्त संघर्ष
युग बदलते है काल बदलते है
मगर जमाने के दस्तूर नही बदलते है
सतयुग में भी कलयुग था और
कलयुग में भी सतयुग है बस
कलयुगी और सतयुगी भावनाओ के अनुपात बदलते है
क्या त्रेता युग में रावण नही था
क्या द्वापर में कंस नही था
राम के अवतार लेने के लिए रावण का
तथा कृष्ण के अवतार के लिए
कंस का होना जरूरी है
न कभी सतयुग पूरी तरह खत्म हुआ
न कभी कलयुग पूरी तरह खत्म होगा
यह दोनों हमेशा मौजूद रहे है हमेशा रहेंगे
इन दोनों में यह अनवरत संघर्ष
हमेशा से चलता आया है हमेशा चलता रहेगा
लाना चाहते हो सतयुग तो
कर लो खुद को समर्थ इतना कि
कलयुग तुम्हारा कुछ बिगाड़ न पाए
हो जायेगा जिस दिन ऐसा
तुम्हारा सतयुग उस दिन ही आ जायेगा II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
युग बदलते है काल बदलते है
मगर जमाने के दस्तूर नही बदलते है
सतयुग में भी कलयुग था और
कलयुग में भी सतयुग है बस
कलयुगी और सतयुगी भावनाओ के अनुपात बदलते है
क्या त्रेता युग में रावण नही था
क्या द्वापर में कंस नही था
राम के अवतार लेने के लिए रावण का
तथा कृष्ण के अवतार के लिए
कंस का होना जरूरी है
न कभी सतयुग पूरी तरह खत्म हुआ
न कभी कलयुग पूरी तरह खत्म होगा
यह दोनों हमेशा मौजूद रहे है हमेशा रहेंगे
इन दोनों में यह अनवरत संघर्ष
हमेशा से चलता आया है हमेशा चलता रहेगा
लाना चाहते हो सतयुग तो
कर लो खुद को समर्थ इतना कि
कलयुग तुम्हारा कुछ बिगाड़ न पाए
हो जायेगा जिस दिन ऐसा
तुम्हारा सतयुग उस दिन ही आ जायेगा II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
Thursday, August 19, 2010
जवाब (ANSWER)
जवाब
अंग्रेजो ने तो बिछाई थी कुर्सिया अपनी
भारत वासियों कि लाशो पर
पर आज के नेताओ ने तो
कुर्सियों के नीचे बिछी लाशो को भी बाँट दिया है
कोई हिन्दू कि लाश पर बिछाये बैठा है कुर्सी
किसी कि कुर्सी के नीचे मुसलमान कि लाश पड़ी है
कोई दलितों कि लाश पर बिछा रहा है कुर्सी
तो कोई सवर्णों कि लाश पर गद्दी बिछा रहा है
कैसे कह दे कि ये नेता हमारे नेता है
ये तो हमे आपस में ही भिड़ा रहे है
ये कैसे है हमारे अपने
जो भाई भाई को आपस में लढ़ा रहे है
क्या सोचा है इन्होने कभी कि
ऐसी चलाई है परम्परा इन्होने
कहीं ऐसा न हो कि किसी आने वाली पीढ़ी में
किसी कुर्सी के नीचे इनके
आने वाले किसी वंशज कि लाश पड़ी हो
क्या होगा तब
क्या इनकी आत्मा इनको कभी माफ़ कर पाएंगी
तब क्या होगी हालत उसकी और
वो अपने रब को क्या जवाब दे पाएंगी II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
अंग्रेजो ने तो बिछाई थी कुर्सिया अपनी
भारत वासियों कि लाशो पर
पर आज के नेताओ ने तो
कुर्सियों के नीचे बिछी लाशो को भी बाँट दिया है
कोई हिन्दू कि लाश पर बिछाये बैठा है कुर्सी
किसी कि कुर्सी के नीचे मुसलमान कि लाश पड़ी है
कोई दलितों कि लाश पर बिछा रहा है कुर्सी
तो कोई सवर्णों कि लाश पर गद्दी बिछा रहा है
कैसे कह दे कि ये नेता हमारे नेता है
ये तो हमे आपस में ही भिड़ा रहे है
ये कैसे है हमारे अपने
जो भाई भाई को आपस में लढ़ा रहे है
क्या सोचा है इन्होने कभी कि
ऐसी चलाई है परम्परा इन्होने
कहीं ऐसा न हो कि किसी आने वाली पीढ़ी में
किसी कुर्सी के नीचे इनके
आने वाले किसी वंशज कि लाश पड़ी हो
क्या होगा तब
क्या इनकी आत्मा इनको कभी माफ़ कर पाएंगी
तब क्या होगी हालत उसकी और
वो अपने रब को क्या जवाब दे पाएंगी II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
KL AAJ AUR KL (YESTERDAY TODAY AND TOMORROW)
कल आज और कल
होते है हम परेशान कि
होगा क्या आने वाले कल में
कभी होते है परेशान हम कि
क्या हो गया बीते हुए कल में
पर है क्या सोचा हमने कि
क्या कर रहे है हम अपने इस आज में
हो सकता है कि हमारा आज
किसी बीते हुए कल का परिणाम हो
बीता हुआ कल तो आज का साथ छोढ़ चुका है
पर आने वाला कल तो अभी आज के साथ में है
क्यों ढूँढ़ते हो दीवानों कि तरह उनको जो छूट गये पीछे
सम्भालो उनको जो चल रहें है साथ में
जीवन के इस सफर में कहीं
छूट गए ये हमसफर भी
तो अकेले तन्हा खड़े रह जायोगे
गुजर जायेंगा कारवां, गुबार देखते रह जायोगे II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
होते है हम परेशान कि
होगा क्या आने वाले कल में
कभी होते है परेशान हम कि
क्या हो गया बीते हुए कल में
पर है क्या सोचा हमने कि
क्या कर रहे है हम अपने इस आज में
हो सकता है कि हमारा आज
किसी बीते हुए कल का परिणाम हो
बीता हुआ कल तो आज का साथ छोढ़ चुका है
पर आने वाला कल तो अभी आज के साथ में है
क्यों ढूँढ़ते हो दीवानों कि तरह उनको जो छूट गये पीछे
सम्भालो उनको जो चल रहें है साथ में
जीवन के इस सफर में कहीं
छूट गए ये हमसफर भी
तो अकेले तन्हा खड़े रह जायोगे
गुजर जायेंगा कारवां, गुबार देखते रह जायोगे II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
MANV SRISHTI
मानव सृष्टि
दुनिया के मेले में हम भटक गए है
अपने जनक से हम बिछड़ गए है
चारो तरफ है शोर अजनबी आवाजो का
नही आता समझ की हम कहाँ गए है
कहीं नामो की आवाज गूँज रही है
कही रिश्तो की पुकार गूँज रही है
कोई हालात की दुहाई दे रहा है
कहीं कहकहो का शोर सुनाई दे रहा है
सब चिंतित है शरीर के शव को लेकर
क्यों मानव शरीर रुपी शव के ईश को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पुकारता
शिव-शक्ति का भेद न कोई जान पाया है
शिव की शक्ति ने सबको भरमाया है
औरत सिर्फ माँ के रूप में छाया है
बाकी तो सब माया है
ये ही तो भगवान कृष्ण की महामाया है
सारी दुनिया को जिसने नचाया है
बड़ो बड़ो को जिसने भरमाया है
सिवा शिव के कोई इसे जान न पाया है
दुःख में हर कोई ऊई माँ तो पुकारता है
पर माँ उमा को क्यों नही बुलाता है
जीना है सही मायनो में तो शिव को जानो
सत्य ही शिव है और शिव ही सत्य है
इस पहले और अंतिम सत्य को पहचानो
ये ही सत्य है और ये ही सुंदर है II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
दुनिया के मेले में हम भटक गए है
अपने जनक से हम बिछड़ गए है
चारो तरफ है शोर अजनबी आवाजो का
नही आता समझ की हम कहाँ गए है
कहीं नामो की आवाज गूँज रही है
कही रिश्तो की पुकार गूँज रही है
कोई हालात की दुहाई दे रहा है
कहीं कहकहो का शोर सुनाई दे रहा है
सब चिंतित है शरीर के शव को लेकर
क्यों मानव शरीर रुपी शव के ईश को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पुकारता
शिव-शक्ति का भेद न कोई जान पाया है
शिव की शक्ति ने सबको भरमाया है
औरत सिर्फ माँ के रूप में छाया है
बाकी तो सब माया है
ये ही तो भगवान कृष्ण की महामाया है
सारी दुनिया को जिसने नचाया है
बड़ो बड़ो को जिसने भरमाया है
सिवा शिव के कोई इसे जान न पाया है
दुःख में हर कोई ऊई माँ तो पुकारता है
पर माँ उमा को क्यों नही बुलाता है
जीना है सही मायनो में तो शिव को जानो
सत्य ही शिव है और शिव ही सत्य है
इस पहले और अंतिम सत्य को पहचानो
ये ही सत्य है और ये ही सुंदर है II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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