आखिर
होते ही पैदा शुरू हो गया
तमाशा दुनिया का
घेरकर मुझे हर कोई,
मेरी शकल अपने से मिलाने लगा
जब पिता के तरफ वालो ने मिलाई शक्ल अपनी तो
माँ की तरफ वालो ने मुह बना लिया
और जब माँ की तरफ वाले शक्ल अपनी मिलाने लगे
तो पिता की तरफ वाला हर कोई मुह बनाने लगा
फिर कुछ हुआ बड़ा तो
दिखाकर खिलौने मुझे ललचाया जाने लगा
दिखाकर प्लास्टिक के घोड़े
मुझे असली से भरमाया जाने लगा
फिर कुछ और बड़ा हुआ
और स्कूल कालेज जाने लगा
देकर उदहारण बड़े बड़े
सिदान्तो का पाठ मुझे पढ़ाया जाने लगा
मान के बात दुनिया की जब उतारने लगा
उन सिदान्तो को जीवन में अपने
तो भटकाने को मुझे उन सिदान्तो से
दुनियादारी का पाठ मुझे पढ़ाया जाने लगा
जब नौकरी की ईमानदारी से
और उठाई आवाज़ जुल्म के खिलाफ
तो निकम्मा और आदर्शवादी का
ताना मुझे सुनाया जाने लगा
देखकर मुझे सरल और भावुक
खूब फायदा उठाया दुनिया ने
चाहे थे वो बेगाने या थे वो अपने
भावनाओ में बहाकर खूब उल्लू मुझे बनाया जाने लगा
किसी ने दोस्त बनकर गद्दारी की
किसी ने व्यापार में भागीदार बनकर बेईमानी की
औए कोई बनकर रिश्तेदार करके बुराई
अपनी दिल की जलन मिटाने लगा
हें ईश्वर शुक्र है तुम्हारा की आपने
पकडकर बाह मेरी मुझे रौशनी दिखाई
और उसमे मुझे दुनिया का
असली बदसूरत चेहरा साफ़ नजर आने लगा
ऐ दुनिया वालो अब बख्शो मुझको और
मत दिखाओ ये झुन झुने
झूठी तरक्की और भोग विलास के ,
करके याद बातें तुम्हारी मेरी आत्मा रोती है
नही करनी मुहब्बत मुझे इस दुनिया से
न मुझे अब किसी से कोई नफरत बाकि है
अब तो बस चाहिये मुझे वो कर्म
जिसकी जरूरत इस दुनिया के पार होती है
जिस किसी ने भी जो छीना मुझसे
वो आखिर में सब रह जायेगा यही
याद रखो दुनिया वालो कि
कफन में नही कोई जेब होती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
Wednesday, September 29, 2010
Tuesday, September 28, 2010
अंत
अंत
तुमने करके मुझे अलग थलग जमाने से
जो किया चतुराई नही की
नही सोचा तुमने कि जब मै रहूँगा सबसे अलग
तो तुम्हारे पास भी कौन आएगा
करवाकर बर्बाद मुझे दुनिया से
तुमने कोई समझदारी ;नही की
नही सोचा तुमने कि हुआ मै बर्बाद तो
अपनी जीत का जश्न तुम कैसे बनाओगे
बनवाकर असहाय मुझे
तुमने कोई बहादुरी नही की
नही सोचा तुमने की हुआ अगर असहाय मै
तो मजबूत तुम भी कैसे रह पाओगे
मै देखता रहा बर्बादी अपनी
बना हुआ असहाय और पंगु
और नही किया अगर प्रतिकार तो भावना
तुम्हे दुनिया के वारो से बचाने कि थी
है वो बात दीगर
कि बात मै ये समझा बाद में
कि नही थी कोई और बात बस
बात तो मुझे झुकाने की थी
मगर हो नीयत ठीक तो
ईश्वर जो करता है वो अच्छा ही करता है
हुआ जब मै अलग थलग तो
उतरा अपनेपन का नकाब हर चेहरे से
जाना मैंने की
नही है दुनिया में कोई अपना
पाते ही मौका हर कोई
एक दूजे की भावनाओ से खिलवाड़ करता है
लुटा जब और छुटा भोग विलास दुनिया का
तब हुआ ये एहसास कि
भोग के लिए किया गया कर्म
आखिर में दुःख का सबब बनता है
पिछले कर्मो कि वजह से
नही मिलता जब सुख
करके कर्म सुख के भोग के लिए
तब इन्सान बड़ा दुखी होता है
और अगर किस्मत से
कहीं मिल जाये उसे सुख
तो भी उसके खोने के डर से
वो सदा दुखी रहता है
क्या करनी कामना ऐसे सुखो की
जो हमेशा रखे दुखी इन्सान को
येही सोच कर अब मेरा हर कर्म
बिना किसी फल की आशा के होता है
अब रहती है येही सोच मन मे
कि कर्तव्य समझकर
किये किसी कर्म का
कभी भी कोई फल नही होता है
अब मै जिस राह पर हूँ चल पड़ा उस राह पर
कोई आज नही कोई बीता कल नही और
कोई आने वाला कल नही, क्योंकि उस राह पर
कर्मो का व्यपार नही होता है
आ रहा है वो वक्त जल्दी जब ये
दुनिया का अस्तित्व दूर क्षितिज में बिन्दुओ सा
बिखर जायेगा और तुम्हारे हमारे रिश्ते का होगा
वो ही हश्र जो ऐसे रिश्ते का होता है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
तुमने करके मुझे अलग थलग जमाने से
जो किया चतुराई नही की
नही सोचा तुमने कि जब मै रहूँगा सबसे अलग
तो तुम्हारे पास भी कौन आएगा
करवाकर बर्बाद मुझे दुनिया से
तुमने कोई समझदारी ;नही की
नही सोचा तुमने कि हुआ मै बर्बाद तो
अपनी जीत का जश्न तुम कैसे बनाओगे
बनवाकर असहाय मुझे
तुमने कोई बहादुरी नही की
नही सोचा तुमने की हुआ अगर असहाय मै
तो मजबूत तुम भी कैसे रह पाओगे
मै देखता रहा बर्बादी अपनी
बना हुआ असहाय और पंगु
और नही किया अगर प्रतिकार तो भावना
तुम्हे दुनिया के वारो से बचाने कि थी
है वो बात दीगर
कि बात मै ये समझा बाद में
कि नही थी कोई और बात बस
बात तो मुझे झुकाने की थी
मगर हो नीयत ठीक तो
ईश्वर जो करता है वो अच्छा ही करता है
हुआ जब मै अलग थलग तो
उतरा अपनेपन का नकाब हर चेहरे से
जाना मैंने की
नही है दुनिया में कोई अपना
पाते ही मौका हर कोई
एक दूजे की भावनाओ से खिलवाड़ करता है
लुटा जब और छुटा भोग विलास दुनिया का
तब हुआ ये एहसास कि
भोग के लिए किया गया कर्म
आखिर में दुःख का सबब बनता है
पिछले कर्मो कि वजह से
नही मिलता जब सुख
करके कर्म सुख के भोग के लिए
तब इन्सान बड़ा दुखी होता है
और अगर किस्मत से
कहीं मिल जाये उसे सुख
तो भी उसके खोने के डर से
वो सदा दुखी रहता है
क्या करनी कामना ऐसे सुखो की
जो हमेशा रखे दुखी इन्सान को
येही सोच कर अब मेरा हर कर्म
बिना किसी फल की आशा के होता है
अब रहती है येही सोच मन मे
कि कर्तव्य समझकर
किये किसी कर्म का
कभी भी कोई फल नही होता है
अब मै जिस राह पर हूँ चल पड़ा उस राह पर
कोई आज नही कोई बीता कल नही और
कोई आने वाला कल नही, क्योंकि उस राह पर
कर्मो का व्यपार नही होता है
आ रहा है वो वक्त जल्दी जब ये
दुनिया का अस्तित्व दूर क्षितिज में बिन्दुओ सा
बिखर जायेगा और तुम्हारे हमारे रिश्ते का होगा
वो ही हश्र जो ऐसे रिश्ते का होता है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
Sunday, September 26, 2010
गलतफहमी
गलतफहमी
आ खड़ा हुआ हूँ आज उस मुकाम पर
जहाँ जिन्दगी एक मजाक लगती है
नही रही कोई चाहत अब जिन्दगी में
अब तो मौत ही छुटकारे का आगाज़ लगती है
नचा रही है दुनिया बनाकर कठपुतली
अपने गन्दे हाथो में फिर भी
जब दिखाता है चमक कोई झूठी ख़ुशी की
तो उसकी हरकत और भी बेजार लगती है
गोल घूम रही है दुनिया
गोल रूपए के आस पास
न कोई दोस्त, न हमदर्द न रिश्तेदार अब तो
स्वार्थ से भरी हमदर्दी दुनिया की
बकवास नजर आती है
बहलाना चाहते हो मुझे दिखाकर
झुनझुना भोग विलास और उम्मीदों का
मगर जानता हूँ मै की बाशिंदे हो
जिस बस्ती के तुम वो बस्ती तो मुझे
स्वार्थो की बदनाम बस्ती नजर आती है
किसको कहूं मै अच्छा और किसको कहूं मै बुरा
कौन सुनता है और कौन करता है परवाह मेरी
जब आती है बात तुम्हारे स्वार्थ की तब
मेरी भावनाए तो उसके सामने बेकार नजर आती है
आखिर कब तक रहोगे करते जुल्मो सितम मुझपर
आखिर कब तक रहोगे कुचलते भावनाओ को मेरी
आखिर कब तक रहोगे समझाते खुदको की
नही किया कुछ भी तुमने गलत मेरे साथ
तुम्हारी हरकते तो उपरवाले को भी बेजार कर जाती है
हो सकता है की बांध दो तुम
आँख पर समाज के स्वार्थ की पट्टी मगर
उपरवाला आँख से नही आत्मा से देखता है
और आत्मा के प्रकाश पर कोई पट्टी नही बंधती
उसे अपने प्रकाश में हर चीज़ साफ़ नजर आती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
आ खड़ा हुआ हूँ आज उस मुकाम पर
जहाँ जिन्दगी एक मजाक लगती है
नही रही कोई चाहत अब जिन्दगी में
अब तो मौत ही छुटकारे का आगाज़ लगती है
नचा रही है दुनिया बनाकर कठपुतली
अपने गन्दे हाथो में फिर भी
जब दिखाता है चमक कोई झूठी ख़ुशी की
तो उसकी हरकत और भी बेजार लगती है
गोल घूम रही है दुनिया
गोल रूपए के आस पास
न कोई दोस्त, न हमदर्द न रिश्तेदार अब तो
स्वार्थ से भरी हमदर्दी दुनिया की
बकवास नजर आती है
बहलाना चाहते हो मुझे दिखाकर
झुनझुना भोग विलास और उम्मीदों का
मगर जानता हूँ मै की बाशिंदे हो
जिस बस्ती के तुम वो बस्ती तो मुझे
स्वार्थो की बदनाम बस्ती नजर आती है
किसको कहूं मै अच्छा और किसको कहूं मै बुरा
कौन सुनता है और कौन करता है परवाह मेरी
जब आती है बात तुम्हारे स्वार्थ की तब
मेरी भावनाए तो उसके सामने बेकार नजर आती है
आखिर कब तक रहोगे करते जुल्मो सितम मुझपर
आखिर कब तक रहोगे कुचलते भावनाओ को मेरी
आखिर कब तक रहोगे समझाते खुदको की
नही किया कुछ भी तुमने गलत मेरे साथ
तुम्हारी हरकते तो उपरवाले को भी बेजार कर जाती है
हो सकता है की बांध दो तुम
आँख पर समाज के स्वार्थ की पट्टी मगर
उपरवाला आँख से नही आत्मा से देखता है
और आत्मा के प्रकाश पर कोई पट्टी नही बंधती
उसे अपने प्रकाश में हर चीज़ साफ़ नजर आती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
सदगति
सदगति
नही किया प्रतिकार अगर हमने तुम्हारा
तो इसे तुम मेरा समर्पण मत समझो
क्योंकि शांति भी कई बार
किसी आने वाले तूफ़ान का संकेत होती है
नही होती हमेशा शांति
स्वीकारोक्ति किसी बात की
कभी कभी ख़ामोशी भी
किसी अत्याचार का विरोध होती है
जरूरी नही की बोलकर
निकाला जाये गुस्सा अपना
कभी कभी दिमाग में
गुस्सा बिठाने की भी जरूरत होती है
तुमने हमेशा समुन्द्र से
उड़ते देखा है जल को भाप बनकर
पर इसका नही एहसास तुम्हे
की उपर से कितनी आग बरसती है
पर्वत से उठते धुंए को मत समझो
अंगीठी का धुआ, नही पता तुम्हे
की ज्वालामुखी में कितनी आग होती है और
फटते है ज्वालामुखी जब तो हर तरफ विनाश लीला होती है
मन को अहंकार से नही बुद्धि से चलाओ
अहंकार से चलने वाले की बहुत दुर्गति होती है
हो सकता है ढाहकर जुल्म हो जाये तुष्टि तुम्हारे अहंकार की
मगर सदगति अहंकार से नही ज्ञान से होती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
नही किया प्रतिकार अगर हमने तुम्हारा
तो इसे तुम मेरा समर्पण मत समझो
क्योंकि शांति भी कई बार
किसी आने वाले तूफ़ान का संकेत होती है
नही होती हमेशा शांति
स्वीकारोक्ति किसी बात की
कभी कभी ख़ामोशी भी
किसी अत्याचार का विरोध होती है
जरूरी नही की बोलकर
निकाला जाये गुस्सा अपना
कभी कभी दिमाग में
गुस्सा बिठाने की भी जरूरत होती है
तुमने हमेशा समुन्द्र से
उड़ते देखा है जल को भाप बनकर
पर इसका नही एहसास तुम्हे
की उपर से कितनी आग बरसती है
पर्वत से उठते धुंए को मत समझो
अंगीठी का धुआ, नही पता तुम्हे
की ज्वालामुखी में कितनी आग होती है और
फटते है ज्वालामुखी जब तो हर तरफ विनाश लीला होती है
मन को अहंकार से नही बुद्धि से चलाओ
अहंकार से चलने वाले की बहुत दुर्गति होती है
हो सकता है ढाहकर जुल्म हो जाये तुष्टि तुम्हारे अहंकार की
मगर सदगति अहंकार से नही ज्ञान से होती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
ऐसा क्यों ?
ऐसा क्यों ?
आज जब मै हूँ पास तुम्हारे
तुम मुझे जानकर भी नही चाहते जानना
क्योंकि लगता है तुम्हे कि
मै ऐसा कैसे हो सकता हूँ
आज जब हूँ मै साथ तुम्हारे
तब चलकर भी तुम साथ हमारे
नही कर पाते विश्वास कि
ऐसा कैसे हो सकता है
मगर हूँ सोचता मै कि
चला जाऊ मै दूर इतना कि
मेरे पास होने का एहसास
भी तुमसे दूर हो जाये
सोचता हूँ कि छोडकर साथ तुम्हारा
कर लू रास्ता अलग अपना ताकि
मेरे साथ होने का एहसास
भी तुमसे दूर हो जाये
हो सकता है अगर चला गया दूर तुमसे
हो जायूँगा मै दूर इतना कि
कैसे करती हो महसूस बिन हमारे
यह एहसास भी हम तक पहुँच न पाए
हो सकता है कि
हो जब जरूरत तुमको
और तुम पुकारो हमको तो
तुम्हारी आवाज़ भी हम तक पहुँच ना पाए
हो सकता है कि तब सोचो तुम
कि ऐसा होता तो वैसा नही होता
और कभी सोचो कि वैसा होता
तो फिर कभी ऐसा न होता
इस ऐसे वैसे कि सोच में
कभी कभी ऐसा कुछ हो जाता है
कि सोचता रहता है इन्सान कि
ऐसा क्यों हो जाता है ई
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
आज जब मै हूँ पास तुम्हारे
तुम मुझे जानकर भी नही चाहते जानना
क्योंकि लगता है तुम्हे कि
मै ऐसा कैसे हो सकता हूँ
आज जब हूँ मै साथ तुम्हारे
तब चलकर भी तुम साथ हमारे
नही कर पाते विश्वास कि
ऐसा कैसे हो सकता है
मगर हूँ सोचता मै कि
चला जाऊ मै दूर इतना कि
मेरे पास होने का एहसास
भी तुमसे दूर हो जाये
सोचता हूँ कि छोडकर साथ तुम्हारा
कर लू रास्ता अलग अपना ताकि
मेरे साथ होने का एहसास
भी तुमसे दूर हो जाये
हो सकता है अगर चला गया दूर तुमसे
हो जायूँगा मै दूर इतना कि
कैसे करती हो महसूस बिन हमारे
यह एहसास भी हम तक पहुँच न पाए
हो सकता है कि
हो जब जरूरत तुमको
और तुम पुकारो हमको तो
तुम्हारी आवाज़ भी हम तक पहुँच ना पाए
हो सकता है कि तब सोचो तुम
कि ऐसा होता तो वैसा नही होता
और कभी सोचो कि वैसा होता
तो फिर कभी ऐसा न होता
इस ऐसे वैसे कि सोच में
कभी कभी ऐसा कुछ हो जाता है
कि सोचता रहता है इन्सान कि
ऐसा क्यों हो जाता है ई
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
सृष्टि
सृष्टि
क्या वाकई उन्नत हुआ मानव
क्या उन्नति का मतलब
बजाय चार पैर के दो पैर पर चलकर
जानवर से महज मानव बनना ही है
रचना की थी उसने समाज की
बनाया था आधार उसने
अपने उस समाज का
प्यार, सहयोग और भाई चारे को
चलाने को समाज उसने बनाये
कुछ नियम और नियमो को
मानने के थे कुछ बंधन जो थे अपनाये उसने
ख़ुशी से खुद को आगे बड़ाने को
मगर ज्यों-ज्यों उन्नति करके
आज आ पहुँचा उस मुकाम पर
जहाँ आज वो ही नियम बंधन
लगते है अपनी प्रगति में बाधा उस को
तोड़ने की चाहत इन बन्धनों को
जा पहुंची है उस मुकाम पर
उफनती है भावनाए उसकी
समझता है बेफाल्तू इन नियमो को
चाहता है उड़ना अकेला पंछी सा
नही चाहता वो की बंधन हो ऊंचाई का
नही चाहता वो बंधन लौटने का
किसी घोंसले में भी साँझ को
रिश्तो में छुपा प्यार तो हो चुका है खत्म
लगते है बोझ ये रिश्ते उसको
है चाहता बेचना वो इन रिश्तो को
अपने स्वार्थ की किसी दुकान पर
है पाशविक उसकी सोच इतनी की
नही मानता वो स्त्री पुरुष के सनातन रिश्ते को भी
लगता है चलकर वो इस राह पर
ले जायेगा इस सृष्टि को विनाश के कगार पर II
लेखक: प्रवीन चंदर झांझी
क्या वाकई उन्नत हुआ मानव
क्या उन्नति का मतलब
बजाय चार पैर के दो पैर पर चलकर
जानवर से महज मानव बनना ही है
रचना की थी उसने समाज की
बनाया था आधार उसने
अपने उस समाज का
प्यार, सहयोग और भाई चारे को
चलाने को समाज उसने बनाये
कुछ नियम और नियमो को
मानने के थे कुछ बंधन जो थे अपनाये उसने
ख़ुशी से खुद को आगे बड़ाने को
मगर ज्यों-ज्यों उन्नति करके
आज आ पहुँचा उस मुकाम पर
जहाँ आज वो ही नियम बंधन
लगते है अपनी प्रगति में बाधा उस को
तोड़ने की चाहत इन बन्धनों को
जा पहुंची है उस मुकाम पर
उफनती है भावनाए उसकी
समझता है बेफाल्तू इन नियमो को
चाहता है उड़ना अकेला पंछी सा
नही चाहता वो की बंधन हो ऊंचाई का
नही चाहता वो बंधन लौटने का
किसी घोंसले में भी साँझ को
रिश्तो में छुपा प्यार तो हो चुका है खत्म
लगते है बोझ ये रिश्ते उसको
है चाहता बेचना वो इन रिश्तो को
अपने स्वार्थ की किसी दुकान पर
है पाशविक उसकी सोच इतनी की
नही मानता वो स्त्री पुरुष के सनातन रिश्ते को भी
लगता है चलकर वो इस राह पर
ले जायेगा इस सृष्टि को विनाश के कगार पर II
लेखक: प्रवीन चंदर झांझी
Saturday, September 25, 2010
अंतिम विदाई
अंतिम विदाई
जब नही पूछता कोई मुझे
तो उससे मै खुश हो जाता हूँ
जाने अनजाने उसके
दायित्व से मै मुक्त हो जाता हूँ
जीवन है लेखा जोखा कर्मो का
अच्छे बुरे कर्म मनुष्य के साथ चलते है
नही छुटकारा इस कर्म बंधन से किसी का
कर्म तो भोगने से ही कटते है
बनता है कोई रिश्ता
परनीति में हमारे पूर्व जन्मो के कर्मो की
जब ठुकराता है कोई तो उसके
उन जन्मो के बन्धनों से छूट जाता हूँ
लगता है कभी कभी की भटकता हुआ आ गया
नही था मेरा जन्मो का रिश्ता इन सबसे
क्योंकि अपने इर्द गिर्द फैले इन रिश्तो की कड़ीयो में
खुद को मै एक अजनबी सा पाता हूँ
कोई भी मुझसे जुड़ा नही महसूस करता
मै भी किसीसे जुड़ा महसूस नही करता
भोगने को पूर्व कर्मो को जुड़ गया इस कड़ी में
वरना मै खुद को इस दुनिया में फिट कहाँ पाता हूँ
इसलिए छोडकर बस एक रिश्ते को
तोड़ता है जब कोई रिश्ता मुझसे
तो करने के लिए आजाद एक और बंधन से
मै उपर वाले का शुक्र मनाता हूँ
है वो एक रिश्ता पिता पुत्र का
है लालसा ये ही की और कुछ मिला या नही मिला
पर चढ़कर अपने पुत्र के कंधे पर
इस दुनिया से अपनी अंतिम विदाई चाहता हूँ II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
जब नही पूछता कोई मुझे
तो उससे मै खुश हो जाता हूँ
जाने अनजाने उसके
दायित्व से मै मुक्त हो जाता हूँ
जीवन है लेखा जोखा कर्मो का
अच्छे बुरे कर्म मनुष्य के साथ चलते है
नही छुटकारा इस कर्म बंधन से किसी का
कर्म तो भोगने से ही कटते है
बनता है कोई रिश्ता
परनीति में हमारे पूर्व जन्मो के कर्मो की
जब ठुकराता है कोई तो उसके
उन जन्मो के बन्धनों से छूट जाता हूँ
लगता है कभी कभी की भटकता हुआ आ गया
नही था मेरा जन्मो का रिश्ता इन सबसे
क्योंकि अपने इर्द गिर्द फैले इन रिश्तो की कड़ीयो में
खुद को मै एक अजनबी सा पाता हूँ
कोई भी मुझसे जुड़ा नही महसूस करता
मै भी किसीसे जुड़ा महसूस नही करता
भोगने को पूर्व कर्मो को जुड़ गया इस कड़ी में
वरना मै खुद को इस दुनिया में फिट कहाँ पाता हूँ
इसलिए छोडकर बस एक रिश्ते को
तोड़ता है जब कोई रिश्ता मुझसे
तो करने के लिए आजाद एक और बंधन से
मै उपर वाले का शुक्र मनाता हूँ
है वो एक रिश्ता पिता पुत्र का
है लालसा ये ही की और कुछ मिला या नही मिला
पर चढ़कर अपने पुत्र के कंधे पर
इस दुनिया से अपनी अंतिम विदाई चाहता हूँ II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
तरीका अपना अपना
तरीका अपना अपना
इन्सान क्यों चाहता है कि
हर कोई एक दूसरे से नफरत करे
इन्सान क्यों यह चाहता है कि
हर कोई सिवा उसके किसी को न अच्छा कहे
शायद वो अपने अंदर कि
कमियों को अच्छे से जानता है
क्या है कमजोरिया उसमे
ये वो अच्छे से पहचानता है
नही चाहता वो कि उठाकर
फायदा उन कमजोरियों का
ऐसा न हो कि कही
कोई उससे आगे निकल जाये
नही कर सकता बर्दाश्त कि
वो वजह से अपनी उन कमजोरियों की
वो कंही किसी से पीछे रह जाये
है ये तरीका एक तो
मिटाकर लाइन दूसरे की
अपनी लाइन को बड़ा किया जाये
या है दूसरा तरीका की
कर लो लाइन अपनी बड़ी इतनी की
दूसरे की लाइन छोटी रह जाये
बदकिस्मत है वो इन्सान जो
दूसरे की बजाये पहला तरीका अपनाता है
वो क्या करेगा छोटा किसी को
वो खुद ही अपनी नजर में छोटा हो जाता है
बनाने मिटाने को लकीरों के इस खेल में
मानव उस फकीर (परमात्मा) को क्यों भूल जाता है
आता है जब वो अपनी आई पर
तो वो सारी लकीरों को ही धो डालता है ई
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
इन्सान क्यों चाहता है कि
हर कोई एक दूसरे से नफरत करे
इन्सान क्यों यह चाहता है कि
हर कोई सिवा उसके किसी को न अच्छा कहे
शायद वो अपने अंदर कि
कमियों को अच्छे से जानता है
क्या है कमजोरिया उसमे
ये वो अच्छे से पहचानता है
नही चाहता वो कि उठाकर
फायदा उन कमजोरियों का
ऐसा न हो कि कही
कोई उससे आगे निकल जाये
नही कर सकता बर्दाश्त कि
वो वजह से अपनी उन कमजोरियों की
वो कंही किसी से पीछे रह जाये
है ये तरीका एक तो
मिटाकर लाइन दूसरे की
अपनी लाइन को बड़ा किया जाये
या है दूसरा तरीका की
कर लो लाइन अपनी बड़ी इतनी की
दूसरे की लाइन छोटी रह जाये
बदकिस्मत है वो इन्सान जो
दूसरे की बजाये पहला तरीका अपनाता है
वो क्या करेगा छोटा किसी को
वो खुद ही अपनी नजर में छोटा हो जाता है
बनाने मिटाने को लकीरों के इस खेल में
मानव उस फकीर (परमात्मा) को क्यों भूल जाता है
आता है जब वो अपनी आई पर
तो वो सारी लकीरों को ही धो डालता है ई
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
सच्चा रिश्ता
सच्चा रिश्ता
पहले मै रिश्तो के लिए जीता था
अब मै सिर्फ रिश्ते निभाता हूँ
पहले मै लोगो को अपना बनाता था
अब सिर्फ रिश्तेदार बनाता हूँ,
जब तक नही था जानता
असलियत इन रिश्तो की
तब तक मेरे जीवन से भी ज्यादा थी
अहमियत इन रिश्तो की
आ गयी अब जब
असलियत सामने इन रिश्तो की
अब और इन रिश्तो की
गहराई में नही डूबना चाहता हूँ
रिश्तो के हर रस में होता है
छुपा जहर कुछ ना कुछ मतलब का
लेकर प्रेरणा भगवान नीलकंठ से
इस जहर को गले तक ही निगलना चाहता हूँ
किसी से बनता है रिश्ता क्योंकि वो धनवान है
किसी से बनता है रिश्ता क्योंकि वो बलवान है
कही निभाता है आदमी रिश्ता क्योंकि बचाना उसे सम्मान है
वरना तो ये रिश्ते जी का जंजाल है
रिश्तो की इस भीड़ में
भूल गए हम एक रिश्ता
की पहले तो है हम में रिश्ता
की हम सब इन्सान है
है असली रिश्ता वही जिसमे हो भरा रस इतना
की ले जाये हमे वो हमारे ईश की और
ऐसा रिश्ता किसी शब्द किसी नाम का
कभी भी मोहताज नही होता,
चाहे हो वो कृष्ण गोपियों का
या वो हो राम भीलनी का
वो किसी और चीज का नही
बस श्रदा और प्रेम का गुलाम होता है II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
पहले मै रिश्तो के लिए जीता था
अब मै सिर्फ रिश्ते निभाता हूँ
पहले मै लोगो को अपना बनाता था
अब सिर्फ रिश्तेदार बनाता हूँ,
जब तक नही था जानता
असलियत इन रिश्तो की
तब तक मेरे जीवन से भी ज्यादा थी
अहमियत इन रिश्तो की
आ गयी अब जब
असलियत सामने इन रिश्तो की
अब और इन रिश्तो की
गहराई में नही डूबना चाहता हूँ
रिश्तो के हर रस में होता है
छुपा जहर कुछ ना कुछ मतलब का
लेकर प्रेरणा भगवान नीलकंठ से
इस जहर को गले तक ही निगलना चाहता हूँ
किसी से बनता है रिश्ता क्योंकि वो धनवान है
किसी से बनता है रिश्ता क्योंकि वो बलवान है
कही निभाता है आदमी रिश्ता क्योंकि बचाना उसे सम्मान है
वरना तो ये रिश्ते जी का जंजाल है
रिश्तो की इस भीड़ में
भूल गए हम एक रिश्ता
की पहले तो है हम में रिश्ता
की हम सब इन्सान है
है असली रिश्ता वही जिसमे हो भरा रस इतना
की ले जाये हमे वो हमारे ईश की और
ऐसा रिश्ता किसी शब्द किसी नाम का
कभी भी मोहताज नही होता,
चाहे हो वो कृष्ण गोपियों का
या वो हो राम भीलनी का
वो किसी और चीज का नही
बस श्रदा और प्रेम का गुलाम होता है II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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