कल आज और कल
होते है हम परेशान कि
होगा क्या आने वाले कल में
कभी होते है परेशान हम कि
क्या हो गया बीते हुए कल में
पर है क्या सोचा हमने कि
क्या कर रहे है हम अपने इस आज में
हो सकता है कि हमारा आज
किसी बीते हुए कल का परिणाम हो
बीता हुआ कल तो आज का साथ छोढ़ चुका है
पर आने वाला कल तो अभी आज के साथ में है
क्यों ढूँढ़ते हो दीवानों कि तरह उनको जो छूट गये पीछे
सम्भालो उनको जो चल रहें है साथ में
जीवन के इस सफर में कहीं
छूट गए ये हमसफर भी
तो अकेले तन्हा खड़े रह जायोगे
गुजर जायेंगा कारवां, गुबार देखते रह जायोगे II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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