अँधेरी नगरी ......
वक़्त ने कभी मेरा साथ नही दिया
चाहा जब की रुक जाये वक़्त
यंही बन्द घड़ी की तरह
मगर समय फिसल गया हाथ से
बनके समुन्द्र की रेत की तरह I
और जब चाहा मैंने कि
निकल जाये वक़्त आंधी कि तरह
तब खड़ा रह गया समय और
बरस गया वो बनके
घनघोर सावन के बादल कि तरह I
कहते है कि वक़्त बड़ा बेईमान होता है
मगर वो आ जाये साथ तो गधा भी पहलवान होता है I
मगर वो सारी बेईमानी हमारे साथ ही करता रहा
वो शायद नाराज था मेरी समझदारी से
इसलिए गधो को पहलवान करता रहा
और धरकर रूप तरह तरह के सदा मुझे छलता रहा I
दू दोष मै किसको अपनी नादानी को जो
अपना न सका चलकर साथ समय के बढती हुई बेईमानी को
या फिर दू दोष अपनी उस सोच सुहानी को
न समझ सका जो मखौटे मै छुपी
दुनिया के स्वार्थ की कहानी को I
था तकाजा यही वक़्त का कि कलपुर्जो का है ये युग
आदमी नही कलपुर्जो का व्यापारी बन जा
न समझ कोई जीवन किसी मे ये सब तो संज्ञा शून्य है
चला इनको जैसे तैसे और इनसे सिर्फ अपना मुनाफा कमा I
करके कोशिश सफाई की इन कलपुर्जो की
जो की है गलती तूने उसका हर्जाना तो देना होगा
कटवाकर हाथ अपने
उन मासूम गुनाहों का जुरमाना तो तुझे भरना होगा I
अब भी वक़्त है कि इस जालिम दुनिया से
जितनी जल्दी हो दूर उड़ जाऊ
नही देखता कोई पाप या पुण्य को यहाँ
क्यों करके पाप मै यहाँ झूठी इज्जत कमाऊ I
है यह अँधेरी नगरी और यंहा का है चौपट राजा
मिलता है यंहा टके सेर भाजी और टके सेर खाजा II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
Friday, October 15, 2010
एक तथा शून्य
एक तथा शून्य
क्यों चाहते हो कि खो जाये मेरा सुब कुछ
क्यों चाहते हो कि हो जाऊ में मोहताज
क्यों चाहते हो बन जाओ बड़ा इस तरह
क्यों चाहते हो करना छोटा मुझे इस तरह
हो सकता है छीन लो तुम सब कुछ मुझसे
हो सकता है इस तरह
हो जाये तुम्हारे अहंकार कि तुष्टि
पर करके ऐसा क्या मुझको मेरी नजर मुझे छोटा या
खुद को खुद कि नजर में बड़ा साबित कर पायोगे I
क्यों हरदम बिछाना चाहते हो कांटे राहों में मेरी
करके ऐसा सिर्फ मेरे पैर नही बल्कि
मेरी आत्मा को लहू लुहान कर जायोगे I
मैंने तो चाहा हरदम कि हो सुगम राहे तेरी
की हरदम कोशिश कि बड़कर थाम लो बांह
अगर तुम कभी लड़ खड़ा जाओ कंही
पर अड़ाकर टांग राहों में मेरी
क्या तुम कभी मुझे मेरी नजर में मुझे गिरा पायोगे I
जब सोचोगे बाद मेरे अपने व्यवहार को
तब आइने में खुद को क्या जवाब दे पायोगे I
जानते हो तुम की सब समझता हूँ मैं
पर जानकर भी कुछ बोल नही पाता हूँ मै
उठा लो बेशक फायेदा खूब मजबूरी का मेरी
पर करके ये सब क्या तुम खुश रह पायोगे I
हो जाये एकत्रित शून्य चाहे जितने भी
पर है मूल्य उन शून्यो का तभी तक
लगा हुआ आगे उनके एक जब तक
जाते ही एक के तुम सब शून्य हो
और शून्य ही रह जायोगे II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
क्यों चाहते हो कि खो जाये मेरा सुब कुछ
क्यों चाहते हो कि हो जाऊ में मोहताज
क्यों चाहते हो बन जाओ बड़ा इस तरह
क्यों चाहते हो करना छोटा मुझे इस तरह
हो सकता है छीन लो तुम सब कुछ मुझसे
हो सकता है इस तरह
हो जाये तुम्हारे अहंकार कि तुष्टि
पर करके ऐसा क्या मुझको मेरी नजर मुझे छोटा या
खुद को खुद कि नजर में बड़ा साबित कर पायोगे I
क्यों हरदम बिछाना चाहते हो कांटे राहों में मेरी
करके ऐसा सिर्फ मेरे पैर नही बल्कि
मेरी आत्मा को लहू लुहान कर जायोगे I
मैंने तो चाहा हरदम कि हो सुगम राहे तेरी
की हरदम कोशिश कि बड़कर थाम लो बांह
अगर तुम कभी लड़ खड़ा जाओ कंही
पर अड़ाकर टांग राहों में मेरी
क्या तुम कभी मुझे मेरी नजर में मुझे गिरा पायोगे I
जब सोचोगे बाद मेरे अपने व्यवहार को
तब आइने में खुद को क्या जवाब दे पायोगे I
जानते हो तुम की सब समझता हूँ मैं
पर जानकर भी कुछ बोल नही पाता हूँ मै
उठा लो बेशक फायेदा खूब मजबूरी का मेरी
पर करके ये सब क्या तुम खुश रह पायोगे I
हो जाये एकत्रित शून्य चाहे जितने भी
पर है मूल्य उन शून्यो का तभी तक
लगा हुआ आगे उनके एक जब तक
जाते ही एक के तुम सब शून्य हो
और शून्य ही रह जायोगे II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
एक औंकार
एक औंकार
सोचते है हम कि
ये ऐसे न होते
तो वो वैसे न होते
न ये ऐसे होते तो न वो वैसे होते
तो शायद मै भी ऐसा न होता
इन्होने ये न किया होता
तो शायद वो ऐसा न करता
हो सकता है कि फिर मै भी ऐसा न होता
ये और वो के चक्रव्यूह में फंसे
हम आज के इन्सान इतना उलझ गये है
कि मै कौन हूँ ये भी शायद भूल गये है
ये कौन है और वो कौन है
जो आज ये है वो कल वो थे
जो कल वो थे वो आज ये है
अगर ये न होते ये तो वो न होते वो
तो न ये होते, न वो होते और न मै ही मै होता
और तभी हम सब शायद हो पाते एक औंकार II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
सोचते है हम कि
ये ऐसे न होते
तो वो वैसे न होते
न ये ऐसे होते तो न वो वैसे होते
तो शायद मै भी ऐसा न होता
इन्होने ये न किया होता
तो शायद वो ऐसा न करता
हो सकता है कि फिर मै भी ऐसा न होता
ये और वो के चक्रव्यूह में फंसे
हम आज के इन्सान इतना उलझ गये है
कि मै कौन हूँ ये भी शायद भूल गये है
ये कौन है और वो कौन है
जो आज ये है वो कल वो थे
जो कल वो थे वो आज ये है
अगर ये न होते ये तो वो न होते वो
तो न ये होते, न वो होते और न मै ही मै होता
और तभी हम सब शायद हो पाते एक औंकार II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
Thursday, October 14, 2010
सृष्टि
सृष्टि
है कहलाता आज का युग कलयुग क्योंकि
नही जीता आज का मानव आज के लिए
वो तो हर रोज़ हरदम आने वाले कल के लिए मरता है
था जब सतयुग तब जीता था इन्सान सिर्फ सच के लिए
चाहे वो सच बीते हुए कल में, आज में
या फिर वो आने वाले कल में होता था
फिर आया त्रेता युग
अब मानव तीनो काल की सोचता था
मगर फिर भी मर्यादाये धर्म की वो नही खोता था
जब आया द्वापर युग तब का मानव
बीते कल की छोड़ सिर्फ आज की फ़िक्र कर रोता था मगर
आने वाले कल के लिए अपने आज को वो भी नही खोता था
अब आया है कलयुग, सोचता है मानव कि
कल तो किसी तरह बीत गया है, आज भी गुजर ही रहा है,
मगर क्या होगा कल को ये ही सोचकर वो उलझ रहा है
वैसे भी है ये कल पुरजो का युग
जहाँ इन्सान भी मशीन बन जाता है
इसलिए भी ये कलयुग कहलाता है
कहता है कोई कि है घर घर में कल- कल
इसलिए ये कलयुग कहलाता है और करने को
यह कलह दूर कलयुग में भगवान का कल्कि अवतार कहलाता है
कल हो या आज हो या फिर कल हो
ये दुनिया सत्य को मिटा नही पायेगी और
सत्य से शुरू हुई यह सृष्टि
और अंत में शिव में ही समा जाएगी II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
है कहलाता आज का युग कलयुग क्योंकि
नही जीता आज का मानव आज के लिए
वो तो हर रोज़ हरदम आने वाले कल के लिए मरता है
था जब सतयुग तब जीता था इन्सान सिर्फ सच के लिए
चाहे वो सच बीते हुए कल में, आज में
या फिर वो आने वाले कल में होता था
फिर आया त्रेता युग
अब मानव तीनो काल की सोचता था
मगर फिर भी मर्यादाये धर्म की वो नही खोता था
जब आया द्वापर युग तब का मानव
बीते कल की छोड़ सिर्फ आज की फ़िक्र कर रोता था मगर
आने वाले कल के लिए अपने आज को वो भी नही खोता था
अब आया है कलयुग, सोचता है मानव कि
कल तो किसी तरह बीत गया है, आज भी गुजर ही रहा है,
मगर क्या होगा कल को ये ही सोचकर वो उलझ रहा है
वैसे भी है ये कल पुरजो का युग
जहाँ इन्सान भी मशीन बन जाता है
इसलिए भी ये कलयुग कहलाता है
कहता है कोई कि है घर घर में कल- कल
इसलिए ये कलयुग कहलाता है और करने को
यह कलह दूर कलयुग में भगवान का कल्कि अवतार कहलाता है
कल हो या आज हो या फिर कल हो
ये दुनिया सत्य को मिटा नही पायेगी और
सत्य से शुरू हुई यह सृष्टि
और अंत में शिव में ही समा जाएगी II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
आराम
आराम
मन में जब पैदा होता है अहंकार
अहंकार से पैदा होता है अधिकार
किसी पर अधिकार का होना ही
है आसक्ति उसके प्रति
किसी पर आसक्ति के अधिकार कि कामना
ही है अहंकार की जनक,
कामना में छिपा है विकार
उस विकार को जानना ही ज्ञान है
ज्ञान से उत्पन्न होता है वैराग्य
और वैराग्य का होना ही कामना का नाश होता है
जब कामना नही होती तो विकार नही होता
और विकार का न होना ही बडाता है ज्ञान को
और ज्ञान बडाता है वैराग्य को और फिर
वैराग्य बडाता है ज्ञान को और दोनों एक दुसरे को बड़ाते है
वैराग्य ही ज्ञान है और ज्ञान ही वैराग्य है
इसको पाना ही इन्सान का सौभाग्य है
बाकी सब तो उसका दुर्भाग्य है
राजा का तो होता है अधिकार सिर्फ एक सीमा में
वैरागी का तो पूरे संसार पर सम्राज्य है
नही झुकाया जब शीश एक वैरागी ने सामने सम्राट सिकंदर के
तो पूछा उससे सिकंदर महान ने कि
क्यों की ऐसी नादानी उस नादान ने
बोला वो वैरागी कि अगर मै सजदे में शीश झुकाऊंगा
तो बताओ बदले में उसके मै क्या पाउँगा
कहा सम्राट ने कि अगर तू सजदे में सिर झुकाएगा
तो भर दूंगा झोली तेरी इतनी दौलत पायेगा
हंसकर बोला वैरागी बता उससे क्या हो जाएगा
बोला सिकंदर कि लगाकर उस दौलत को व्यापार में
तो और दौलत कमाएगा और फिर
लेकर उस दौलत को बैठकर खूब आराम फरमाएगा
एक बार फिर हंसा वैरागी और कहा ऐ सम्राट
तू क्यों चाहता है कि मै अपना मन भटका लू
और मोह माया में फिर से खुद को फंसा लू
नही रखता मै कुछ भी बचाकर इसलिए
नही है चिंता मुझे कुछ खो जाने की
है नही साथ मेरे कुछ सिवा मेरे ज्ञान के
तो नही है फ़िक्र मुझे कुछ बचाने की
जहाँ जहाँ जब जब चाहता हूँ वहां वहां मै जाता हूँ
जहाँ जब जैसे चाहूँ वहां वैसे आराम फरमाता हूँ
है राज यही मेरी बेफिक्री का
जिसपर मै इतना इतराता हूँ
शायद इसीलिए सामने किसी सम्राट के नही
बस उपरवाले के सामने ही शीश नवाता हूँ
हुआ शर्मिंदा और बोला यह सम्राट कि
सुनने ले सभी जनता मेरी ये बात
कि बाद मरने के रखना कफन के बाहर मेरे हाथ
ताकि जमाना भी ये देखे कि सिकन्दर भी
मरने के बाद कुछ नही ले गया साथ
इसलिए जीत इन्सान कि नही है
भोग विलास में बल्कि वैराग्य में है
आसक्ति भोग विलास में मानव का
सौभाग्य नही है बल्कि दुर्भाग्य है
जीते है निर्लिप्त होकर अपना जीवन
इस जग में ये योगी लोग
दुःख हो या सुख हो है मानते उसे
वो अपने संचित कर्मो का भोग II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
मन में जब पैदा होता है अहंकार
अहंकार से पैदा होता है अधिकार
किसी पर अधिकार का होना ही
है आसक्ति उसके प्रति
किसी पर आसक्ति के अधिकार कि कामना
ही है अहंकार की जनक,
कामना में छिपा है विकार
उस विकार को जानना ही ज्ञान है
ज्ञान से उत्पन्न होता है वैराग्य
और वैराग्य का होना ही कामना का नाश होता है
जब कामना नही होती तो विकार नही होता
और विकार का न होना ही बडाता है ज्ञान को
और ज्ञान बडाता है वैराग्य को और फिर
वैराग्य बडाता है ज्ञान को और दोनों एक दुसरे को बड़ाते है
वैराग्य ही ज्ञान है और ज्ञान ही वैराग्य है
इसको पाना ही इन्सान का सौभाग्य है
बाकी सब तो उसका दुर्भाग्य है
राजा का तो होता है अधिकार सिर्फ एक सीमा में
वैरागी का तो पूरे संसार पर सम्राज्य है
नही झुकाया जब शीश एक वैरागी ने सामने सम्राट सिकंदर के
तो पूछा उससे सिकंदर महान ने कि
क्यों की ऐसी नादानी उस नादान ने
बोला वो वैरागी कि अगर मै सजदे में शीश झुकाऊंगा
तो बताओ बदले में उसके मै क्या पाउँगा
कहा सम्राट ने कि अगर तू सजदे में सिर झुकाएगा
तो भर दूंगा झोली तेरी इतनी दौलत पायेगा
हंसकर बोला वैरागी बता उससे क्या हो जाएगा
बोला सिकंदर कि लगाकर उस दौलत को व्यापार में
तो और दौलत कमाएगा और फिर
लेकर उस दौलत को बैठकर खूब आराम फरमाएगा
एक बार फिर हंसा वैरागी और कहा ऐ सम्राट
तू क्यों चाहता है कि मै अपना मन भटका लू
और मोह माया में फिर से खुद को फंसा लू
नही रखता मै कुछ भी बचाकर इसलिए
नही है चिंता मुझे कुछ खो जाने की
है नही साथ मेरे कुछ सिवा मेरे ज्ञान के
तो नही है फ़िक्र मुझे कुछ बचाने की
जहाँ जहाँ जब जब चाहता हूँ वहां वहां मै जाता हूँ
जहाँ जब जैसे चाहूँ वहां वैसे आराम फरमाता हूँ
है राज यही मेरी बेफिक्री का
जिसपर मै इतना इतराता हूँ
शायद इसीलिए सामने किसी सम्राट के नही
बस उपरवाले के सामने ही शीश नवाता हूँ
हुआ शर्मिंदा और बोला यह सम्राट कि
सुनने ले सभी जनता मेरी ये बात
कि बाद मरने के रखना कफन के बाहर मेरे हाथ
ताकि जमाना भी ये देखे कि सिकन्दर भी
मरने के बाद कुछ नही ले गया साथ
इसलिए जीत इन्सान कि नही है
भोग विलास में बल्कि वैराग्य में है
आसक्ति भोग विलास में मानव का
सौभाग्य नही है बल्कि दुर्भाग्य है
जीते है निर्लिप्त होकर अपना जीवन
इस जग में ये योगी लोग
दुःख हो या सुख हो है मानते उसे
वो अपने संचित कर्मो का भोग II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
Wednesday, October 13, 2010
भीख
भीख
कुछ लोग चाहते है कि
झुठला कर मेरे दर्द को
वो मुझे नीचा दिखाए
पर कहता हूँ मै कि
पहले वो मेरे जितने जख्म तो खाए
नही मुश्किल है निकलना
आह का मुख से
पर मजा तब है जब
आह दिल के अंदर से आये
माना कि लिख सकता है कोई भी
पर है लिखना वो ही जो
लेखन को आप बीती सा लिख पाए
अपनी नजर से जो देखा वो ही संसार है
जो दुसरो ने समझाया वो सब बेकार है
जलाना चाहते हो जो दुनिया को
तो पहले खुद जलना सीखो
तुम क्या मिटाओगे किसी को
पहले खुद तो मिटना सीखो
क्यों ढूंढते हो कंधा किसीका
रखने को बंदूक अपनी
पहले करके कंधा मजबूत अपना
उसपर बंदूक तो ढंग से रखना सीखो
जब तक ढूंढते रहोगे कंधे दूसरो के
कभी बंदूक चलाना नही सीख पाओगे
नही पाओगे अधिकार कभी
जब भी पाओगे भीख पाओगे II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
कुछ लोग चाहते है कि
झुठला कर मेरे दर्द को
वो मुझे नीचा दिखाए
पर कहता हूँ मै कि
पहले वो मेरे जितने जख्म तो खाए
नही मुश्किल है निकलना
आह का मुख से
पर मजा तब है जब
आह दिल के अंदर से आये
माना कि लिख सकता है कोई भी
पर है लिखना वो ही जो
लेखन को आप बीती सा लिख पाए
अपनी नजर से जो देखा वो ही संसार है
जो दुसरो ने समझाया वो सब बेकार है
जलाना चाहते हो जो दुनिया को
तो पहले खुद जलना सीखो
तुम क्या मिटाओगे किसी को
पहले खुद तो मिटना सीखो
क्यों ढूंढते हो कंधा किसीका
रखने को बंदूक अपनी
पहले करके कंधा मजबूत अपना
उसपर बंदूक तो ढंग से रखना सीखो
जब तक ढूंढते रहोगे कंधे दूसरो के
कभी बंदूक चलाना नही सीख पाओगे
नही पाओगे अधिकार कभी
जब भी पाओगे भीख पाओगे II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
दीवाने
दीवाने
कुछ ऐसे दीवाने होते है
जो मन से परवाने होते है
जो न होते हँ बीता हुआ
कल जो कभी आ न सके
जो न होते है आने वाला कल
जिसे तुम पा न सको ,
वो होते है सिर्फ आज
जिसे पा लिया तो पा लिया
वरना वो ख्वाब पुराने होते है
कुछ ऐसे दीवाने ,,,,,,,,,
सोचता है जमाना कि जानता है उन्हें
मगर होते है वो करीब जब और
जो नही अपनाया उन्हें तब
तो वो हो जाये बेगाने कब
इस बात से वो खुद भी अनजाने होते है
कुछ ऐसे दीवाने ................................
नही समझते वो भाषा समझदारी या चतुराई कि
है ढाई अक्षर प्रेम कि उन्होंने पढ़ाई कि
पाना है उन्हें तो जलना होगा आग सा
जल जाये जो आग पर प्यार से ये वो परवाने होते है
कुछ ऐसे दीवाने ................................
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
कुछ ऐसे दीवाने होते है
जो मन से परवाने होते है
जो न होते हँ बीता हुआ
कल जो कभी आ न सके
जो न होते है आने वाला कल
जिसे तुम पा न सको ,
वो होते है सिर्फ आज
जिसे पा लिया तो पा लिया
वरना वो ख्वाब पुराने होते है
कुछ ऐसे दीवाने ,,,,,,,,,
सोचता है जमाना कि जानता है उन्हें
मगर होते है वो करीब जब और
जो नही अपनाया उन्हें तब
तो वो हो जाये बेगाने कब
इस बात से वो खुद भी अनजाने होते है
कुछ ऐसे दीवाने ................................
नही समझते वो भाषा समझदारी या चतुराई कि
है ढाई अक्षर प्रेम कि उन्होंने पढ़ाई कि
पाना है उन्हें तो जलना होगा आग सा
जल जाये जो आग पर प्यार से ये वो परवाने होते है
कुछ ऐसे दीवाने ................................
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
माँ मर्जी तेरी
माँ मर्जी तेरी
ऐ माँ उचिया पहाडा वाली
है माँ किरपा तेरी जो
सानू तू सद दी है
करोड़ो है बालक तेरे पर
गोदी चक दे नई तू थक दी है
ऐ माँ उचिया .............................
है दुनिया दे जंजाल बतेरे
मोह माया दे पये ने फेरे
तेरे बच्च्या नू है जो घेरे
ऐ जन्म मरण दे घेढ़े
कर किरपा तू ही ओना नू कट दी है
ऐ माँ उचिया ......................................
जदों है हंसदे बच्चे तेरे
नाल ओना दे तू हंस दी है
पर है जो निमाने बेचारे
तू ख्याल ओना दा ज्यादा रख दी है
ऐ माँ उचिया .........................................
ऐ बालक तेरा भी है तेनू बुलान्दा
चाहे चंगा कह या मंदा कह
दर तेरे ते फेरे है लान दा
चाहे तार चाहे मार, ऐ हुन तेरी मर्जी है
ऐ माँ उचिया ................................
निवेदक : प्रवीन चन्द्र झांझी
ऐ माँ उचिया पहाडा वाली
है माँ किरपा तेरी जो
सानू तू सद दी है
करोड़ो है बालक तेरे पर
गोदी चक दे नई तू थक दी है
ऐ माँ उचिया .............................
है दुनिया दे जंजाल बतेरे
मोह माया दे पये ने फेरे
तेरे बच्च्या नू है जो घेरे
ऐ जन्म मरण दे घेढ़े
कर किरपा तू ही ओना नू कट दी है
ऐ माँ उचिया ......................................
जदों है हंसदे बच्चे तेरे
नाल ओना दे तू हंस दी है
पर है जो निमाने बेचारे
तू ख्याल ओना दा ज्यादा रख दी है
ऐ माँ उचिया .........................................
ऐ बालक तेरा भी है तेनू बुलान्दा
चाहे चंगा कह या मंदा कह
दर तेरे ते फेरे है लान दा
चाहे तार चाहे मार, ऐ हुन तेरी मर्जी है
ऐ माँ उचिया ................................
निवेदक : प्रवीन चन्द्र झांझी
Thursday, October 7, 2010
मंजिल के पार
मंजिल के पार
परिंदे के जब पर निकले
तो सोचता था वो कि
एक दिन वो असमान से पार
दूर दूसरी दुनिया तक उड़ जायेगा
फिर जब भरी उड़ान पहली
तो आयी समझ कि नही आसान राहे इतनी
है दूर मंजिल उसकी और इतनी आसानी
से वो आसमान को नही छू पायेगा
फिर करके वो इरादा हर रोज
एक नयी उड़ान भर जाता था
कि आज वो बहुत दूर तक जाएगा
और अपनी मंजिल को पा जायेगा
इसी तरह बीतता गया समय
और वो यू ही सोचता हुआ
रोज उड़ जाता था और शाम को थककर
अपने घोंसले में लौट आता था
हो जाती थी रात और वो
सोचता हुआ सो जाता था
कल फिर होगी नई सुबह और
वो नई उड़ान भर पायेगा
फिर समय बीतता गया और
उसकी नजर कमजोर होने लगी
और होने लगे पंख शिथिल अब
मंजिल और दूर होने लगी
फिर आया वो दिन जब
ये पंख ये शरीर यंही रह गया
वो उड़ा ऐसा कि बिना
पंख के ही मंजिल को पा गया II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
परिंदे के जब पर निकले
तो सोचता था वो कि
एक दिन वो असमान से पार
दूर दूसरी दुनिया तक उड़ जायेगा
फिर जब भरी उड़ान पहली
तो आयी समझ कि नही आसान राहे इतनी
है दूर मंजिल उसकी और इतनी आसानी
से वो आसमान को नही छू पायेगा
फिर करके वो इरादा हर रोज
एक नयी उड़ान भर जाता था
कि आज वो बहुत दूर तक जाएगा
और अपनी मंजिल को पा जायेगा
इसी तरह बीतता गया समय
और वो यू ही सोचता हुआ
रोज उड़ जाता था और शाम को थककर
अपने घोंसले में लौट आता था
हो जाती थी रात और वो
सोचता हुआ सो जाता था
कल फिर होगी नई सुबह और
वो नई उड़ान भर पायेगा
फिर समय बीतता गया और
उसकी नजर कमजोर होने लगी
और होने लगे पंख शिथिल अब
मंजिल और दूर होने लगी
फिर आया वो दिन जब
ये पंख ये शरीर यंही रह गया
वो उड़ा ऐसा कि बिना
पंख के ही मंजिल को पा गया II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
मिलन
मिलन
अब है ये कामना की
अब कभी कोई कामना न हो
अब न हो किसी कामयाबी की चाहत ताकि
फिर से कभी नाकामयाबी का सामना न हो
कुछ पा लेने की तमन्ना ही
होती है मूल कारण कामना का
न हो कुछ खो जाने का डर इसलिए
कुछ पा लेने की ही भावना न हो
भावना ही है कामना की जननी
अहंकार ही है जनक भावना का
अहंकार बनाता है माध्यम मन को इसीलिए
हूँ चाहता की मन में पैदा ही कोई भावना न हो
ज्ञानेन्द्रिया देती है सूचना मन को
मन देता है आज्ञा कर्मेन्द्रियो को
छोडकर बुद्धि को हो अहंकार का कब्जा मन पर
ऐसी परस्थिति का कभी सामना न हो
मूल में बुद्धि के है सत्ता आत्मा की
अहंकार का है कारण भटकाव इन्द्रियों का
हो मन वश में बुद्धि के
अहंकार की कभी भावना न हो
बुद्धि की बताई राह पर
जब मन चला जायेगा
इन्द्रियों को तब करके वश में
अंदर की तरफ मोड़ ले जायेगा
करके महसूस अंदर के आनन्द को
इन्द्रियों का भटकाव खत्म हो जायेगा
इसी राह के अंत में आत्मा का
परमात्मा से मिलन हो जायेगा II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
अब है ये कामना की
अब कभी कोई कामना न हो
अब न हो किसी कामयाबी की चाहत ताकि
फिर से कभी नाकामयाबी का सामना न हो
कुछ पा लेने की तमन्ना ही
होती है मूल कारण कामना का
न हो कुछ खो जाने का डर इसलिए
कुछ पा लेने की ही भावना न हो
भावना ही है कामना की जननी
अहंकार ही है जनक भावना का
अहंकार बनाता है माध्यम मन को इसीलिए
हूँ चाहता की मन में पैदा ही कोई भावना न हो
ज्ञानेन्द्रिया देती है सूचना मन को
मन देता है आज्ञा कर्मेन्द्रियो को
छोडकर बुद्धि को हो अहंकार का कब्जा मन पर
ऐसी परस्थिति का कभी सामना न हो
मूल में बुद्धि के है सत्ता आत्मा की
अहंकार का है कारण भटकाव इन्द्रियों का
हो मन वश में बुद्धि के
अहंकार की कभी भावना न हो
बुद्धि की बताई राह पर
जब मन चला जायेगा
इन्द्रियों को तब करके वश में
अंदर की तरफ मोड़ ले जायेगा
करके महसूस अंदर के आनन्द को
इन्द्रियों का भटकाव खत्म हो जायेगा
इसी राह के अंत में आत्मा का
परमात्मा से मिलन हो जायेगा II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
Wednesday, October 6, 2010
पुकार
पुकार
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही
जब भी दुत्कारता था जमाना मुझे
तू फट से मुझे सीने से लगा लेती थी
जब दोड़ता था कोई मारने को मुझे
तू फट से आंचल में अपने मुझे छुपा लेती थी
कहाँ से आया हूँ मै ये
मेरे कदमो की आहट से तू जान लेती थी
कही गिर ना जाऊ खाकर ठोकर इसलिए
बढकर बाहं मेरी तुम थाम लेती थी
जब एक दिन तू चली गयी
छोडकर मुझे हमेशा के लिए
तब नही जान पाया की
जिन्दगी बिन तेरे ऐसी हो जाएगी
जो दुनिया नही देखती थी कभी
आँख उठाकर मेरी ओर वो
ऐसी कठोर हो जाएगी और जाते ही तेरे
ये खुशिया यूं मुझसे नाता तोड़ जाएगी
जाते ही तेरे अचानक
मै बच्चे से बड़ा हो गया
और बताने को मुझे हरकोई
फर्ज़ मेरे डंडा लेकर खड़ा हो गया
जब देखती होगी तू उपर से हाल मेरा
तेरी आत्मा भी तो रोती होगी
क्या हो गया हाल लाल का तेरे
ये देखकर तू भी तो आँखें भिगोती होगी
जो बालक तेरा घबरा जाता था एक
गर्म हवा के झोंके से वो लाल तेरा आज
अकेला दुनिया की धूप में खड़ा
वक़्त के थपेड़े खा रहा है और करके तुझे याद माँ
अब भी तुझे बुला रहा है
कहरहा है वो सुबक सुबक के कि
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही
जब भी दुत्कारता था जमाना मुझे
तू फट से मुझे सीने से लगा लेती थी
जब दोड़ता था कोई मारने को मुझे
तू फट से आंचल में अपने मुझे छुपा लेती थी
कहाँ से आया हूँ मै ये
मेरे कदमो की आहट से तू जान लेती थी
कही गिर ना जाऊ खाकर ठोकर इसलिए
बढकर बाहं मेरी तुम थाम लेती थी
जब एक दिन तू चली गयी
छोडकर मुझे हमेशा के लिए
तब नही जान पाया की
जिन्दगी बिन तेरे ऐसी हो जाएगी
जो दुनिया नही देखती थी कभी
आँख उठाकर मेरी ओर वो
ऐसी कठोर हो जाएगी और जाते ही तेरे
ये खुशिया यूं मुझसे नाता तोड़ जाएगी
जाते ही तेरे अचानक
मै बच्चे से बड़ा हो गया
और बताने को मुझे हरकोई
फर्ज़ मेरे डंडा लेकर खड़ा हो गया
जब देखती होगी तू उपर से हाल मेरा
तेरी आत्मा भी तो रोती होगी
क्या हो गया हाल लाल का तेरे
ये देखकर तू भी तो आँखें भिगोती होगी
जो बालक तेरा घबरा जाता था एक
गर्म हवा के झोंके से वो लाल तेरा आज
अकेला दुनिया की धूप में खड़ा
वक़्त के थपेड़े खा रहा है और करके तुझे याद माँ
अब भी तुझे बुला रहा है
कहरहा है वो सुबक सुबक के कि
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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