Friday, October 15, 2010

अँधेरी नगरी ......

अँधेरी नगरी ......

वक़्त ने कभी मेरा साथ नही दिया
चाहा जब की रुक जाये वक़्त
यंही बन्द घड़ी की तरह
मगर समय फिसल गया हाथ से
बनके समुन्द्र की रेत की तरह  I
और जब चाहा मैंने  कि
निकल जाये वक़्त आंधी कि तरह
तब खड़ा रह गया समय और
बरस गया वो बनके 
घनघोर सावन के बादल कि तरह  I

कहते है कि वक़्त बड़ा बेईमान होता है
मगर वो आ जाये साथ तो गधा भी पहलवान होता है I
मगर वो सारी बेईमानी हमारे साथ ही करता रहा
वो शायद नाराज था मेरी समझदारी से
इसलिए गधो को पहलवान करता रहा
और धरकर रूप तरह तरह के सदा मुझे छलता रहा  I

दू दोष मै किसको अपनी नादानी को जो
अपना न सका चलकर साथ समय के बढती हुई  बेईमानी को
या फिर दू दोष अपनी उस सोच सुहानी को
न समझ सका जो मखौटे मै छुपी
दुनिया के स्वार्थ की कहानी को  I
था तकाजा यही वक़्त का कि कलपुर्जो का है ये युग
आदमी नही कलपुर्जो का व्यापारी बन जा
न समझ कोई जीवन किसी मे ये सब तो संज्ञा शून्य है  
चला इनको जैसे तैसे और इनसे सिर्फ अपना मुनाफा कमा I

करके कोशिश सफाई की इन कलपुर्जो की
जो की है गलती तूने उसका हर्जाना तो देना होगा
कटवाकर हाथ अपने
उन मासूम गुनाहों का जुरमाना तो तुझे भरना होगा  I
अब भी वक़्त है कि इस जालिम दुनिया से
जितनी जल्दी हो दूर उड़ जाऊ
नही देखता कोई पाप या पुण्य को यहाँ
क्यों करके पाप मै यहाँ झूठी इज्जत कमाऊ I 
है यह अँधेरी नगरी और यंहा का है चौपट राजा
मिलता है यंहा टके सेर भाजी और टके सेर खाजा  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी   

एक तथा शून्य

एक तथा शून्य

क्यों चाहते हो कि खो जाये मेरा सुब कुछ
क्यों चाहते हो कि हो जाऊ में मोहताज
क्यों चाहते हो बन जाओ बड़ा इस तरह
क्यों चाहते हो करना छोटा मुझे इस तरह
हो सकता है छीन लो तुम सब कुछ मुझसे
हो सकता है इस तरह
हो जाये तुम्हारे  अहंकार कि तुष्टि
पर करके ऐसा क्या मुझको मेरी नजर मुझे छोटा या
खुद को खुद कि नजर में बड़ा साबित कर पायोगे I
क्यों हरदम बिछाना चाहते हो कांटे राहों में मेरी
करके ऐसा सिर्फ मेरे पैर नही बल्कि
मेरी आत्मा को लहू लुहान कर जायोगे I
मैंने तो चाहा हरदम कि हो सुगम राहे तेरी
की हरदम कोशिश कि बड़कर थाम लो बांह
अगर तुम कभी लड़ खड़ा जाओ कंही
पर अड़ाकर टांग राहों में मेरी
क्या तुम कभी मुझे मेरी नजर में मुझे गिरा पायोगे I
जब सोचोगे बाद मेरे अपने व्यवहार को
तब आइने में खुद को क्या जवाब दे पायोगे I
जानते हो तुम की सब समझता हूँ मैं
पर जानकर भी कुछ बोल नही पाता हूँ मै
उठा लो बेशक फायेदा खूब मजबूरी का मेरी 
पर करके ये सब क्या तुम खुश रह पायोगे  I
हो जाये एकत्रित शून्य चाहे जितने भी
पर है मूल्य उन शून्यो का तभी तक
लगा हुआ आगे उनके एक जब तक
जाते ही एक के तुम सब शून्य हो
और शून्य ही रह जायोगे II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी         

एक औंकार

एक औंकार
सोचते है हम कि
ये ऐसे न होते
तो वो वैसे न होते
न ये ऐसे होते तो न वो वैसे होते
तो शायद   मै भी ऐसा न होता

इन्होने ये न किया होता
तो शायद वो ऐसा न करता
हो सकता है कि फिर मै भी ऐसा न होता
ये और वो के चक्रव्यूह में फंसे
हम आज के इन्सान इतना उलझ गये है
कि मै कौन हूँ ये भी शायद भूल गये है

ये कौन है और वो कौन है
जो आज ये है वो कल वो थे
जो कल वो थे वो आज ये है
अगर ये न होते ये तो वो न होते वो
तो न ये होते, न वो होते और न मै ही मै होता
और तभी हम सब शायद हो पाते  एक औंकार  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी    

Thursday, October 14, 2010

सृष्टि

         सृष्टि

है कहलाता आज का युग कलयुग क्योंकि
नही जीता आज का मानव आज के लिए
वो तो हर रोज़ हरदम आने वाले कल के लिए मरता है

था जब सतयुग तब जीता था इन्सान सिर्फ सच  के लिए
चाहे वो सच बीते हुए कल में, आज में
या फिर वो  आने वाले कल में होता था

फिर आया त्रेता युग
अब मानव तीनो काल की सोचता था
मगर फिर भी मर्यादाये धर्म की वो  नही खोता था

जब आया द्वापर युग तब का मानव
बीते कल की छोड़ सिर्फ आज  की फ़िक्र कर रोता था मगर
आने वाले कल के लिए अपने आज को वो भी नही खोता था

अब आया है कलयुग, सोचता है मानव कि
कल तो किसी तरह बीत गया है, आज भी गुजर ही रहा है,
मगर क्या होगा कल को ये ही सोचकर वो उलझ रहा है

वैसे भी है ये कल पुरजो का युग
जहाँ इन्सान भी मशीन बन जाता है
इसलिए भी ये कलयुग कहलाता है

कहता है कोई कि है घर घर में कल- कल
इसलिए ये कलयुग कहलाता है और करने को
यह कलह दूर कलयुग में भगवान का कल्कि अवतार कहलाता है 

कल हो या आज हो या फिर कल हो
ये दुनिया  सत्य को मिटा नही पायेगी  और
सत्य से शुरू हुई यह सृष्टि
और अंत में  शिव में ही समा जाएगी  II  

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी

 

आराम

    आराम

मन में जब पैदा होता है अहंकार
अहंकार से पैदा होता है अधिकार
किसी पर अधिकार का होना ही
है आसक्ति उसके प्रति
किसी पर आसक्ति के अधिकार कि कामना
ही है अहंकार की  जनक,
कामना में छिपा है विकार
उस विकार को जानना ही ज्ञान है
ज्ञान से उत्पन्न होता है वैराग्य
और वैराग्य का होना ही कामना का नाश होता है
जब कामना नही होती तो विकार नही होता
और विकार का न होना ही बडाता है ज्ञान को
और ज्ञान बडाता है वैराग्य को और फिर
वैराग्य बडाता है ज्ञान को और दोनों एक दुसरे को बड़ाते है
वैराग्य ही ज्ञान है और ज्ञान ही वैराग्य है
इसको पाना ही इन्सान का सौभाग्य है
बाकी सब तो उसका दुर्भाग्य है

राजा का तो होता है अधिकार सिर्फ एक सीमा में
वैरागी का तो पूरे संसार पर सम्राज्य है
नही झुकाया जब शीश एक वैरागी ने सामने सम्राट सिकंदर के
तो पूछा उससे सिकंदर महान ने कि
क्यों की ऐसी नादानी उस नादान ने
बोला वो वैरागी कि अगर मै सजदे में शीश झुकाऊंगा
तो बताओ बदले में उसके मै क्या पाउँगा
कहा सम्राट ने कि अगर तू सजदे में सिर झुकाएगा
तो भर दूंगा झोली तेरी इतनी दौलत पायेगा
हंसकर बोला वैरागी बता उससे क्या हो जाएगा
बोला सिकंदर कि लगाकर उस दौलत को व्यापार में
तो और दौलत कमाएगा और फिर
लेकर उस दौलत को बैठकर खूब  आराम फरमाएगा 
एक बार फिर हंसा वैरागी और कहा ऐ सम्राट
तू क्यों चाहता है कि मै अपना मन भटका लू
और मोह माया में फिर से खुद को फंसा लू
नही रखता मै कुछ भी बचाकर इसलिए
नही है चिंता मुझे कुछ खो जाने की
है नही साथ मेरे कुछ सिवा मेरे ज्ञान के
तो नही है फ़िक्र मुझे कुछ बचाने की
जहाँ जहाँ जब जब चाहता हूँ वहां वहां मै जाता हूँ
जहाँ जब जैसे चाहूँ वहां वैसे आराम फरमाता हूँ
है राज यही मेरी बेफिक्री का
जिसपर मै इतना इतराता हूँ
शायद इसीलिए सामने किसी सम्राट के नही
बस उपरवाले के सामने  ही शीश नवाता हूँ
हुआ शर्मिंदा और बोला यह सम्राट कि
सुनने ले सभी जनता मेरी ये बात
कि बाद मरने के रखना कफन के बाहर मेरे हाथ
ताकि जमाना भी ये देखे कि सिकन्दर भी
मरने के बाद कुछ नही ले गया साथ

इसलिए जीत इन्सान कि नही है
भोग विलास में बल्कि वैराग्य में है
आसक्ति भोग विलास में मानव का
सौभाग्य नही है बल्कि दुर्भाग्य है
जीते है निर्लिप्त होकर अपना जीवन
इस जग में  ये  योगी लोग
दुःख हो या सुख हो है मानते उसे
वो अपने संचित कर्मो का भोग II

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी   


        

Wednesday, October 13, 2010

भीख

भीख

कुछ लोग चाहते है कि
झुठला कर मेरे दर्द को
वो मुझे नीचा दिखाए
पर कहता हूँ मै कि
पहले वो मेरे जितने जख्म तो खाए
नही मुश्किल है निकलना
आह का मुख से
पर मजा तब है जब
आह दिल के अंदर से आये
माना कि लिख सकता है कोई भी
पर है लिखना वो ही जो
लेखन को आप बीती सा लिख पाए

अपनी नजर से जो देखा वो ही संसार है
जो दुसरो ने समझाया वो सब बेकार है
जलाना चाहते हो जो दुनिया को
तो पहले खुद जलना सीखो
तुम क्या मिटाओगे किसी को
पहले खुद तो मिटना सीखो

क्यों ढूंढते हो कंधा किसीका
रखने को बंदूक अपनी
पहले करके कंधा मजबूत अपना
उसपर बंदूक तो ढंग से रखना सीखो
जब तक ढूंढते रहोगे कंधे दूसरो के
कभी बंदूक चलाना नही सीख पाओगे 
नही पाओगे अधिकार कभी
जब भी पाओगे भीख पाओगे  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

दीवाने

दीवाने
कुछ ऐसे दीवाने होते है
जो मन से परवाने  होते है
जो न होते हँ बीता हुआ
कल जो कभी आ न सके
जो न होते है आने वाला कल
जिसे तुम पा न सको ,
वो होते है सिर्फ आज
जिसे पा लिया तो पा लिया
वरना वो ख्वाब पुराने होते है
कुछ ऐसे दीवाने ,,,,,,,,,
सोचता है जमाना कि जानता है उन्हें
मगर होते है वो करीब जब और
जो नही अपनाया उन्हें तब
तो वो हो जाये बेगाने कब 
इस बात से वो खुद भी अनजाने होते है
कुछ ऐसे दीवाने ................................
नही समझते वो भाषा समझदारी या चतुराई कि
है ढाई अक्षर प्रेम कि उन्होंने पढ़ाई कि
पाना है उन्हें तो जलना होगा आग सा
जल जाये जो आग पर प्यार से ये वो परवाने होते है
कुछ ऐसे दीवाने ................................

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
  

माँ मर्जी तेरी

माँ मर्जी तेरी

ऐ माँ उचिया पहाडा वाली
है माँ किरपा तेरी जो
 सानू तू सद दी है
करोड़ो है बालक तेरे पर
गोदी चक दे नई तू थक दी है
 ऐ माँ उचिया .............................
है दुनिया दे जंजाल बतेरे
मोह माया दे पये ने फेरे
तेरे बच्च्या नू है जो घेरे
ऐ जन्म मरण दे घेढ़े
कर किरपा तू ही ओना नू कट दी है
 ऐ माँ उचिया ......................................
जदों है हंसदे बच्चे तेरे
नाल ओना दे तू हंस दी है
पर है जो निमाने बेचारे
तू ख्याल ओना दा ज्यादा रख दी है
 ऐ माँ उचिया .........................................
ऐ बालक तेरा  भी है तेनू बुलान्दा
चाहे चंगा कह या मंदा कह
दर तेरे ते फेरे है लान दा
चाहे तार चाहे मार, ऐ हुन तेरी मर्जी है
 ऐ माँ उचिया ................................

निवेदक : प्रवीन चन्द्र झांझी

Thursday, October 7, 2010

मंजिल के पार

मंजिल के पार

परिंदे के जब पर निकले
तो सोचता था वो कि
एक दिन वो असमान से पार
दूर दूसरी दुनिया तक उड़ जायेगा

फिर जब भरी उड़ान पहली
तो आयी समझ कि नही आसान राहे इतनी
है दूर मंजिल उसकी और इतनी आसानी
से वो आसमान को नही छू पायेगा

फिर करके वो इरादा हर रोज
एक नयी उड़ान भर जाता था
कि आज वो बहुत दूर तक जाएगा
और अपनी मंजिल को पा जायेगा

इसी तरह बीतता गया समय
और वो यू ही सोचता हुआ
रोज उड़ जाता था और शाम को थककर
अपने घोंसले में लौट आता था

हो जाती थी रात और वो 
सोचता हुआ सो जाता था
कल फिर होगी नई सुबह और
वो नई उड़ान भर पायेगा

फिर समय बीतता गया और
उसकी नजर कमजोर होने लगी
और होने लगे पंख शिथिल अब 
मंजिल और दूर होने लगी

फिर आया वो दिन जब
ये पंख ये शरीर यंही रह गया
वो उड़ा ऐसा कि बिना
पंख के ही मंजिल को पा गया II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी  
 

मिलन

मिलन

अब है ये कामना की
अब कभी कोई कामना न हो
अब न हो किसी कामयाबी की चाहत ताकि 
फिर से कभी नाकामयाबी का सामना न हो 

कुछ पा लेने की तमन्ना ही 
होती है मूल कारण कामना का 
न हो कुछ खो जाने का डर इसलिए 
कुछ पा लेने की ही भावना न हो 

भावना ही है कामना की जननी 
अहंकार ही है जनक भावना का 
अहंकार बनाता है माध्यम मन को इसीलिए 
हूँ चाहता की मन में पैदा ही कोई भावना न हो 

ज्ञानेन्द्रिया देती है सूचना मन को 
मन देता है आज्ञा कर्मेन्द्रियो को 
छोडकर बुद्धि को हो अहंकार का कब्जा मन पर 
ऐसी परस्थिति  का कभी सामना न हो 

 मूल में बुद्धि  के है सत्ता आत्मा की 
अहंकार का है कारण भटकाव इन्द्रियों का
हो मन वश में बुद्धि के
अहंकार की कभी भावना न हो

बुद्धि की बताई राह पर
जब मन चला जायेगा
इन्द्रियों को तब करके वश में
अंदर की तरफ मोड़ ले जायेगा

करके महसूस अंदर के आनन्द को 
इन्द्रियों का भटकाव खत्म हो जायेगा 
इसी राह के अंत  में आत्मा का
परमात्मा से मिलन हो जायेगा  II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी  

Wednesday, October 6, 2010

पुकार

पुकार

माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही

जब भी दुत्कारता था जमाना मुझे
तू फट से मुझे सीने से लगा लेती थी
जब दोड़ता था कोई मारने को मुझे
तू फट से आंचल में अपने मुझे छुपा लेती थी

कहाँ से आया हूँ मै ये
मेरे कदमो की आहट से तू जान लेती थी
कही गिर ना जाऊ खाकर ठोकर इसलिए
बढकर बाहं मेरी तुम थाम लेती थी

जब एक दिन तू चली गयी
छोडकर मुझे हमेशा के लिए
तब नही जान पाया की
जिन्दगी बिन तेरे ऐसी हो जाएगी

जो दुनिया नही देखती थी कभी
आँख उठाकर मेरी ओर वो
ऐसी कठोर हो जाएगी और जाते ही तेरे
ये खुशिया यूं मुझसे नाता तोड़ जाएगी

जाते ही तेरे अचानक
मै बच्चे से बड़ा हो गया
और बताने को मुझे हरकोई
फर्ज़ मेरे डंडा लेकर खड़ा हो गया 

जब देखती होगी तू उपर से हाल मेरा
तेरी आत्मा भी तो रोती होगी
क्या हो गया हाल लाल का तेरे
ये देखकर तू भी तो आँखें भिगोती होगी

जो बालक तेरा घबरा जाता था एक
गर्म हवा के झोंके से वो लाल तेरा आज
अकेला दुनिया की धूप में  खड़ा
वक़्त के थपेड़े खा रहा है और करके तुझे याद माँ
अब भी तुझे बुला रहा है

कहरहा है वो सुबक सुबक के कि
माँ जब से छूटा है आंचल तेरा
मै तब से ठीक से सोया नही
जब से तूने छोड़े पौंछने आंसू मेरे
तब से कभी खुलकर मै रोया नही II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

Wednesday, September 29, 2010

आखिर

आखिर

होते ही पैदा शुरू हो गया
 तमाशा दुनिया का
घेरकर मुझे हर कोई,
मेरी शकल अपने से मिलाने लगा

जब पिता के तरफ वालो ने मिलाई शक्ल अपनी तो
माँ की तरफ वालो ने मुह बना लिया 
और जब माँ की तरफ वाले शक्ल अपनी मिलाने लगे
तो पिता की तरफ वाला हर कोई मुह बनाने लगा

फिर कुछ हुआ बड़ा तो
दिखाकर खिलौने मुझे ललचाया जाने लगा
दिखाकर प्लास्टिक के घोड़े
मुझे असली से भरमाया जाने लगा

फिर कुछ और बड़ा हुआ
और स्कूल कालेज जाने लगा
देकर उदहारण बड़े बड़े
सिदान्तो का पाठ मुझे पढ़ाया जाने लगा

मान के बात दुनिया की जब उतारने लगा
उन सिदान्तो को जीवन में अपने
तो भटकाने को मुझे उन सिदान्तो से
 दुनियादारी का पाठ मुझे पढ़ाया जाने लगा

जब नौकरी की ईमानदारी से
और उठाई आवाज़ जुल्म के खिलाफ 
तो निकम्मा और आदर्शवादी का
ताना मुझे सुनाया जाने लगा

देखकर मुझे सरल और भावुक
खूब फायदा उठाया दुनिया ने
चाहे थे वो बेगाने या थे वो अपने
भावनाओ में बहाकर खूब उल्लू मुझे बनाया जाने लगा

किसी ने दोस्त बनकर गद्दारी की
किसी ने व्यापार में भागीदार बनकर बेईमानी की
औए कोई बनकर रिश्तेदार करके बुराई 
अपनी दिल की जलन मिटाने लगा

हें ईश्वर शुक्र है तुम्हारा की आपने
पकडकर बाह मेरी मुझे रौशनी दिखाई
और उसमे मुझे दुनिया का
असली बदसूरत चेहरा साफ़ नजर आने लगा

ऐ दुनिया वालो अब बख्शो मुझको और
मत दिखाओ ये झुन झुने
झूठी तरक्की और भोग विलास के ,
करके याद बातें तुम्हारी मेरी आत्मा रोती है

नही करनी मुहब्बत मुझे इस दुनिया से
न मुझे अब किसी से कोई नफरत बाकि है
अब तो बस चाहिये मुझे वो कर्म 
जिसकी जरूरत  इस दुनिया के पार होती है

जिस किसी ने भी जो छीना मुझसे
वो आखिर में सब रह जायेगा यही
याद रखो दुनिया वालो कि
कफन में नही कोई जेब होती है II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 
  

Tuesday, September 28, 2010

अंत

अंत

तुमने करके मुझे अलग थलग जमाने से
जो किया चतुराई नही की
नही सोचा तुमने कि जब मै रहूँगा सबसे अलग
तो तुम्हारे पास भी कौन आएगा

करवाकर बर्बाद  मुझे दुनिया से
तुमने कोई समझदारी ;नही की
नही सोचा तुमने कि हुआ मै बर्बाद तो
अपनी जीत का जश्न तुम कैसे बनाओगे

बनवाकर असहाय मुझे
तुमने कोई बहादुरी नही की
नही सोचा तुमने की हुआ अगर असहाय मै
तो मजबूत तुम भी कैसे रह पाओगे

मै देखता रहा बर्बादी अपनी
बना हुआ असहाय और पंगु
और नही किया अगर प्रतिकार तो  भावना
तुम्हे दुनिया के वारो से बचाने कि थी

है वो बात दीगर
कि बात मै ये समझा बाद में
कि नही थी कोई और बात बस
बात तो मुझे झुकाने की थी

मगर हो नीयत ठीक तो
ईश्वर जो करता है वो अच्छा ही करता है
हुआ जब मै अलग थलग तो
उतरा अपनेपन का नकाब हर चेहरे से

जाना मैंने की
नही है दुनिया में कोई अपना
पाते ही मौका हर कोई
एक दूजे की भावनाओ से खिलवाड़ करता है

लुटा जब और छुटा भोग विलास दुनिया का
तब हुआ ये एहसास कि
भोग के लिए किया गया  कर्म
आखिर में दुःख का सबब बनता है

पिछले कर्मो कि वजह से
नही मिलता जब सुख
करके कर्म सुख के भोग के लिए
तब इन्सान बड़ा दुखी होता है

और अगर किस्मत से
कहीं मिल जाये उसे सुख
तो भी उसके खोने के डर  से
वो सदा दुखी रहता है

क्या करनी कामना ऐसे सुखो की
जो हमेशा रखे दुखी इन्सान को
येही सोच कर अब मेरा हर  कर्म
बिना किसी फल की आशा के होता है

अब रहती है येही सोच मन मे
कि कर्तव्य समझकर
किये किसी कर्म का
कभी भी कोई फल नही होता है

अब मै जिस राह पर हूँ चल पड़ा उस राह पर
कोई आज नही कोई बीता कल नही और
कोई आने वाला कल नही, क्योंकि उस राह पर
कर्मो का व्यपार नही होता  है

आ रहा है वो वक्त जल्दी जब ये
दुनिया का अस्तित्व  दूर क्षितिज में बिन्दुओ सा
बिखर जायेगा  और तुम्हारे हमारे रिश्ते का होगा
 वो ही हश्र जो ऐसे रिश्ते का होता है II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी 

Sunday, September 26, 2010

गलतफहमी

गलतफहमी

आ खड़ा हुआ हूँ आज उस मुकाम पर
जहाँ जिन्दगी एक मजाक लगती है
नही रही कोई चाहत अब जिन्दगी में
अब तो मौत ही छुटकारे का आगाज़ लगती है

नचा रही है दुनिया बनाकर कठपुतली
अपने गन्दे हाथो में फिर भी
जब दिखाता है चमक कोई झूठी ख़ुशी की
तो उसकी हरकत और भी बेजार लगती है

गोल घूम रही है दुनिया 
गोल रूपए के आस पास
न कोई दोस्त, न हमदर्द न रिश्तेदार अब तो
स्वार्थ से भरी हमदर्दी दुनिया की
 बकवास नजर आती है

बहलाना चाहते हो मुझे दिखाकर
झुनझुना भोग विलास और उम्मीदों का
मगर जानता हूँ मै की बाशिंदे हो
जिस बस्ती के तुम वो बस्ती तो मुझे
 स्वार्थो की बदनाम बस्ती नजर आती है

किसको कहूं मै अच्छा और किसको कहूं मै बुरा
कौन सुनता है और कौन करता है परवाह मेरी
जब आती है बात तुम्हारे स्वार्थ की तब
 मेरी भावनाए  तो उसके सामने बेकार नजर आती है

आखिर कब तक रहोगे करते जुल्मो सितम मुझपर
आखिर कब तक रहोगे कुचलते भावनाओ को मेरी
आखिर कब तक रहोगे समझाते खुदको की
नही किया कुछ भी तुमने गलत मेरे साथ
तुम्हारी हरकते तो उपरवाले को भी बेजार कर जाती  है

हो सकता है की बांध दो तुम
आँख पर समाज के स्वार्थ की पट्टी मगर
 उपरवाला आँख से नही आत्मा से देखता है
और आत्मा के प्रकाश पर कोई पट्टी नही बंधती  
उसे अपने प्रकाश में हर चीज़ साफ़ नजर आती है  II 


लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी   

सदगति

सदगति

नही किया प्रतिकार अगर हमने तुम्हारा
तो इसे तुम मेरा समर्पण मत समझो
क्योंकि शांति भी कई बार
किसी आने वाले तूफ़ान का संकेत होती है

नही होती हमेशा शांति
स्वीकारोक्ति किसी बात की  
कभी कभी ख़ामोशी भी  
किसी अत्याचार का विरोध होती है

जरूरी नही की बोलकर
निकाला जाये गुस्सा अपना
कभी कभी दिमाग में 
गुस्सा बिठाने की भी जरूरत होती है 

तुमने हमेशा समुन्द्र से 
उड़ते देखा है जल को भाप बनकर 
पर इसका नही एहसास तुम्हे 
की उपर से कितनी आग बरसती है 

पर्वत से उठते धुंए को मत समझो
अंगीठी का धुआ, नही पता तुम्हे
की ज्वालामुखी में कितनी आग होती है और
फटते है ज्वालामुखी जब तो  हर तरफ विनाश लीला होती है

मन को अहंकार से नही बुद्धि से चलाओ
अहंकार से चलने वाले की बहुत दुर्गति होती है
हो सकता है ढाहकर जुल्म हो जाये तुष्टि तुम्हारे अहंकार की 
मगर सदगति अहंकार से नही ज्ञान से होती है II 

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

ऐसा क्यों ?

ऐसा क्यों ?

आज जब मै हूँ पास तुम्हारे
तुम मुझे जानकर भी नही चाहते जानना
क्योंकि लगता है तुम्हे कि
मै ऐसा कैसे हो सकता हूँ

आज जब हूँ मै साथ तुम्हारे
तब चलकर भी तुम साथ हमारे
नही कर पाते विश्वास कि
ऐसा कैसे हो सकता है

मगर हूँ सोचता मै कि
चला जाऊ मै दूर इतना कि
मेरे पास होने का एहसास
भी तुमसे दूर हो जाये

सोचता हूँ कि छोडकर साथ तुम्हारा
कर लू रास्ता अलग अपना ताकि
मेरे साथ होने का एहसास
भी तुमसे दूर हो जाये 

हो सकता है अगर चला गया दूर तुमसे
हो जायूँगा मै दूर इतना कि
कैसे करती हो महसूस बिन हमारे
यह एहसास भी हम तक पहुँच न पाए 
   
हो सकता है कि
हो जब जरूरत तुमको
और तुम पुकारो हमको तो
तुम्हारी आवाज़ भी हम तक पहुँच ना पाए

हो सकता है कि तब सोचो तुम
कि ऐसा होता तो वैसा नही होता
और कभी सोचो कि वैसा होता
 तो फिर कभी ऐसा न होता

इस ऐसे वैसे कि सोच में
कभी कभी ऐसा कुछ हो जाता है
कि सोचता रहता है इन्सान कि
ऐसा क्यों  हो जाता है ई

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

सृष्टि

सृष्टि

क्या वाकई उन्नत हुआ मानव
क्या उन्नति का मतलब
बजाय चार पैर के दो पैर पर चलकर
जानवर से महज मानव बनना ही है

रचना की थी उसने समाज की
बनाया था आधार उसने
अपने उस समाज का
प्यार, सहयोग और भाई चारे को

चलाने को समाज उसने बनाये
 कुछ नियम और नियमो को
 मानने के थे कुछ बंधन जो थे अपनाये उसने
 ख़ुशी से खुद को आगे बड़ाने को

मगर ज्यों-ज्यों उन्नति करके
आज आ पहुँचा उस मुकाम पर
जहाँ आज वो ही  नियम बंधन
 लगते है अपनी प्रगति में बाधा उस को

तोड़ने की चाहत इन बन्धनों को
जा पहुंची है उस मुकाम पर
उफनती है भावनाए उसकी  
समझता है बेफाल्तू इन नियमो  को

चाहता है उड़ना अकेला पंछी सा
नही चाहता वो की बंधन हो ऊंचाई का
नही चाहता वो बंधन लौटने का
किसी घोंसले में भी  साँझ को

रिश्तो में छुपा प्यार तो हो चुका है खत्म 
लगते है बोझ ये रिश्ते उसको
है चाहता बेचना वो इन रिश्तो को    
अपने स्वार्थ की किसी दुकान पर

है पाशविक उसकी सोच इतनी की
नही मानता वो स्त्री पुरुष के सनातन रिश्ते को भी
लगता है चलकर वो इस राह पर
ले जायेगा इस सृष्टि को विनाश के कगार  पर II


लेखक:  प्रवीन चंदर झांझी 

Saturday, September 25, 2010

अंतिम विदाई

अंतिम विदाई

जब नही पूछता कोई मुझे
तो उससे मै खुश हो जाता हूँ
जाने अनजाने उसके
 दायित्व से मै मुक्त हो जाता हूँ

जीवन है लेखा जोखा कर्मो का
अच्छे बुरे कर्म मनुष्य के साथ चलते है
नही छुटकारा इस कर्म बंधन से किसी का
कर्म तो भोगने से ही कटते है

बनता है कोई रिश्ता
परनीति में हमारे पूर्व जन्मो के कर्मो की
जब ठुकराता है कोई तो उसके
उन  जन्मो के बन्धनों से छूट जाता हूँ

लगता है कभी कभी की भटकता हुआ आ गया
नही था मेरा जन्मो  का रिश्ता इन सबसे
क्योंकि अपने इर्द गिर्द फैले इन रिश्तो की कड़ीयो में
खुद को मै एक  अजनबी सा पाता हूँ

कोई भी मुझसे जुड़ा नही महसूस करता
मै भी किसीसे जुड़ा महसूस नही करता
भोगने को पूर्व कर्मो को जुड़ गया इस कड़ी में
वरना मै खुद को इस दुनिया में फिट कहाँ पाता हूँ

इसलिए छोडकर बस एक रिश्ते को
तोड़ता है जब कोई रिश्ता मुझसे
तो करने के लिए आजाद एक और बंधन से
मै उपर वाले का शुक्र मनाता हूँ

है वो एक रिश्ता पिता पुत्र का
है लालसा ये ही की और कुछ मिला या नही मिला
 पर चढ़कर  अपने पुत्र के कंधे पर
इस दुनिया से अपनी अंतिम विदाई चाहता हूँ  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी  

तरीका अपना अपना

तरीका अपना अपना  

इन्सान क्यों चाहता है कि
हर कोई एक दूसरे से नफरत करे
इन्सान क्यों यह चाहता है कि
हर कोई सिवा उसके किसी को न अच्छा कहे

शायद वो अपने अंदर कि
कमियों को अच्छे से जानता है
क्या है कमजोरिया उसमे
ये वो अच्छे से पहचानता है

नही चाहता वो कि उठाकर
 फायदा उन कमजोरियों का
ऐसा न हो कि कही
कोई उससे आगे निकल जाये

नही कर सकता बर्दाश्त कि
वो वजह से अपनी उन कमजोरियों की
वो कंही किसी से पीछे रह जाये

है ये तरीका एक तो
मिटाकर लाइन दूसरे की
अपनी लाइन को बड़ा किया जाये

या है दूसरा तरीका की
कर लो लाइन अपनी बड़ी इतनी की
दूसरे की लाइन छोटी रह जाये

बदकिस्मत है वो इन्सान जो
दूसरे की बजाये पहला तरीका अपनाता है
वो क्या करेगा छोटा किसी को
वो खुद ही अपनी नजर में छोटा हो जाता है

बनाने मिटाने को लकीरों के इस खेल में
मानव उस फकीर (परमात्मा) को क्यों भूल जाता है
आता है जब वो अपनी आई पर
तो वो सारी लकीरों को ही धो डालता है ई

लेखक :  प्रवीन चन्द्र झांझी

सच्चा रिश्ता

सच्चा रिश्ता

पहले मै रिश्तो के लिए जीता था
अब मै सिर्फ रिश्ते निभाता हूँ
पहले मै लोगो को अपना बनाता था
अब सिर्फ रिश्तेदार बनाता हूँ,

जब तक नही था जानता
असलियत इन रिश्तो की
तब तक मेरे जीवन से भी ज्यादा थी
 अहमियत इन रिश्तो की

आ गयी अब जब
 असलियत सामने इन रिश्तो की
अब और इन रिश्तो की
 गहराई में नही डूबना चाहता हूँ

रिश्तो के हर रस में होता है
छुपा जहर कुछ ना कुछ मतलब का
लेकर प्रेरणा भगवान नीलकंठ से
इस जहर को गले तक ही निगलना चाहता हूँ

किसी से बनता है रिश्ता क्योंकि वो धनवान है
किसी से बनता है रिश्ता क्योंकि वो बलवान है
कही निभाता है आदमी रिश्ता  क्योंकि बचाना उसे सम्मान है
वरना तो  ये रिश्ते जी का जंजाल है

रिश्तो की इस भीड़ में
भूल गए हम एक रिश्ता
की पहले तो है हम में रिश्ता
की हम सब इन्सान है

है असली रिश्ता वही जिसमे हो भरा रस इतना
 की ले जाये हमे वो हमारे  ईश की और
ऐसा रिश्ता किसी शब्द किसी नाम का
कभी भी मोहताज नही होता,

चाहे हो वो कृष्ण गोपियों का
या वो हो राम भीलनी का
वो किसी और चीज का नही
बस श्रदा और प्रेम का गुलाम होता है II

लेखक :  प्रवीन चन्द्र झांझी

Tuesday, August 24, 2010

दीवार (WALL)

दीवार

जानता जो इतना कि तुम चाहती हो माया को इतना
तो शायद तुम्हे मै कभी न चाहता
चाहता जो मै भी पैसे को तो
शायद तुम्हे कभी भी न अपनाता

हो सकता है कि अपनाना तुम्हे मेरी नादानी थी
हो सकता है कि बननी यूँ ही
मेरी बर्बादी कि कहानी थी
हो सकता है कि यूँ ही मेरी
विकृत तस्वीर जमाने को तुमने दिखानी थी

पर क्या तुम हमेशा के लिए
सच्चाई को छुपा पाओगी
मानता हूँ स्वार्थी है जमाना
पर क्या हमेशा तुम
जमाने के स्वार्थो कि पूर्ति कर पाओगी

पर जानती हो कि
 क्या हो सकता है अंजाम इसका
कि एक डोर है उन बीते पलो कि
उड़  रही है सहारे जिसके
 पतंग जिन्दगी कि

मगर अब यह डोर भी
हाथ से निकली जा रही है
और ये बेरुखी आपस में
जो आ गयी है बीच में हमारे
अब नफरत कि दीवार सी बनती जा रही है

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी

अन्धकार (DARKNESS)

अन्धकार

बाहर के अंधे पर क्यों तरस खाता है
पहले अंदर के अंधकार को क्यों नही मिटाता है
बाहर का अँधा तो है मजबूर कि नही दिखाई देता उसको
पर तूं तो देखकर भी सबकुछ फिर भी आँखें मूंदे जाता है

इस पंच भूत के शरीर पर
तो तूं नही करता बर्दाश्त
एक कण भी धूल का
मगर इस आत्मा पर लिपटे इस मैले शरीर पर
तूं क्यों बेतहाशा मुग्ध हुआ जाता है

खुली आँख से तो दीखता है कुछ दूर तक
कुछ अच्छा है कुछ बुरा यह संसार है
मूँद ले आँख और कर ध्यान उस मालिक का
अंदर तेरे छुपा एक पूरा नेसर्गिक ब्रह्मांड है

देख लेगा जो अंदर का संसार एक बार
नही आएगा कभी  तरस तुझे
उन बिना आँख के अंधे के अंधकार पर
आयेगा तुझे तरस उन आँखों वालो के
अंदर फैले उस अंधकार पर  II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी 

ऐसा क्यों है (WHY IT IS SO)

ऐसा क्यों है
जमाने कि हर नई ठोकर
कर देती है मुझको एक
और कदम नजदीक आपके

जमाने कि हरेक बेरुखी
बड़ा देती है और
मेरी चाहत आपमें

जमाने का हरेक धोखा
बड़ा देता है विश्वास
मेरा और भी आपमे

शायद आप भी ये चाहते हो कि
मार मार के ठोकरे जमाना
कर दे कठोर मुझे इतना कि
लगाकर भभूति, जमकर धूनी
मै भी आपकी तरह मस्त हो जाऊ

शायद चाहते हो आप कि
दिखाए जमाना बेरुखी मुझे इतनी कि
मोड़कर मुहं अपना जमाने से
सदा के लिए आप कि
शरण में मै चला आऊं

शायद चाहते हो आप कि
खाऊँ मै जमाने से धोखें इतने कि
सिवा आपके मै दुनिया में
किसी और पर कभी
 विश्वास न कर पाऊँ

सच है प्रभु कि आप ही पहला
और आप ही हो आखरी सच
आप ही हो सुंदर सबसे
और आप ही हो शिव

है आप से ये विनती मेरी कि
विश्वास मेरा यूँ ही बनाये रखना
और मुझे अपने चरणों
से लगाये रखना II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी  

अनवर्त संघर्ष (CONTINOUS FIGHT)

अनवर्त संघर्ष
युग बदलते है काल बदलते है
मगर जमाने के दस्तूर नही बदलते है
सतयुग में भी कलयुग था और
कलयुग में भी सतयुग है बस
कलयुगी और सतयुगी भावनाओ के अनुपात बदलते है

क्या त्रेता युग में रावण नही था
क्या द्वापर में कंस नही था
राम के अवतार लेने के लिए रावण का
तथा कृष्ण के अवतार के लिए
कंस का होना जरूरी है

न कभी सतयुग पूरी तरह खत्म हुआ
न कभी कलयुग पूरी तरह खत्म होगा
यह दोनों हमेशा मौजूद रहे है हमेशा रहेंगे
इन दोनों में यह अनवरत संघर्ष
हमेशा से चलता आया है हमेशा चलता रहेगा

लाना चाहते हो सतयुग तो
कर लो खुद को समर्थ इतना कि
कलयुग तुम्हारा कुछ बिगाड़ न पाए
हो जायेगा जिस दिन ऐसा
तुम्हारा सतयुग उस दिन ही  आ जायेगा II

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी 

Thursday, August 19, 2010

जवाब (ANSWER)

जवाब
अंग्रेजो ने तो बिछाई थी कुर्सिया अपनी
भारत वासियों कि लाशो पर
पर आज के नेताओ ने तो
कुर्सियों के नीचे बिछी लाशो को भी बाँट दिया है

कोई हिन्दू कि लाश पर बिछाये बैठा  है कुर्सी
किसी कि कुर्सी के नीचे मुसलमान कि लाश पड़ी है
कोई दलितों कि लाश पर बिछा रहा है कुर्सी
तो कोई सवर्णों कि लाश पर गद्दी बिछा रहा है

कैसे कह दे कि ये नेता हमारे नेता है
ये तो हमे आपस में ही भिड़ा  रहे है
ये कैसे है हमारे अपने
जो भाई भाई को आपस में लढ़ा रहे है

क्या सोचा है इन्होने कभी  कि
ऐसी चलाई है परम्परा इन्होने
कहीं ऐसा न हो कि किसी आने वाली पीढ़ी  में
किसी कुर्सी के नीचे इनके
आने वाले किसी वंशज कि लाश पड़ी हो

क्या होगा तब
क्या इनकी आत्मा इनको कभी माफ़ कर पाएंगी
तब क्या होगी हालत उसकी और
वो अपने रब को क्या जवाब दे पाएंगी  II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी 

KL AAJ AUR KL (YESTERDAY TODAY AND TOMORROW)

कल आज और कल

होते है हम परेशान कि
होगा क्या आने वाले कल में
कभी होते है परेशान हम कि
क्या हो गया बीते हुए कल में

पर है क्या सोचा हमने कि
क्या कर रहे है हम अपने इस आज में
हो सकता है कि हमारा आज
किसी बीते हुए कल का परिणाम हो

बीता हुआ कल तो आज का साथ छोढ़ चुका है
पर आने वाला कल तो अभी आज के साथ में है
क्यों ढूँढ़ते हो दीवानों कि तरह  उनको जो छूट गये पीछे
सम्भालो उनको जो चल रहें है साथ में

जीवन के इस सफर में कहीं
छूट गए  ये हमसफर भी
तो अकेले तन्हा  खड़े रह जायोगे
गुजर जायेंगा कारवां, गुबार देखते रह जायोगे II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी     
 

MANV SRISHTI

मानव सृष्टि
दुनिया के मेले में हम भटक गए है
अपने जनक से हम बिछड़ गए है
चारो तरफ है शोर अजनबी आवाजो का
नही आता समझ की हम कहाँ  गए है

कहीं नामो की आवाज गूँज रही है 
कही रिश्तो की पुकार गूँज रही है 
कोई हालात की दुहाई दे रहा है 
कहीं कहकहो का शोर सुनाई दे रहा है 

सब चिंतित है शरीर के शव को लेकर
क्यों मानव शरीर रुपी शव के ईश को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पुकारता

शिव-शक्ति का भेद न कोई जान पाया है
शिव की शक्ति ने सबको भरमाया है
औरत सिर्फ माँ के रूप  में  छाया है
बाकी  तो  सब माया  है


ये ही तो भगवान कृष्ण  की महामाया है
सारी दुनिया को जिसने नचाया है
बड़ो  बड़ो को जिसने भरमाया   है
सिवा शिव के कोई इसे जान न पाया है

दुःख में हर कोई ऊई माँ तो पुकारता है
पर माँ उमा को क्यों नही बुलाता है
जीना है सही मायनो में तो शिव को जानो
सत्य ही शिव है और शिव ही सत्य है
इस पहले और अंतिम सत्य को पहचानो
ये ही सत्य है और ये ही सुंदर है II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी