ऐसा क्यों है
जमाने कि हर नई ठोकर
कर देती है मुझको एक
और कदम नजदीक आपके
जमाने कि हरेक बेरुखी
बड़ा देती है और
मेरी चाहत आपमें
जमाने का हरेक धोखा
बड़ा देता है विश्वास
मेरा और भी आपमे
शायद आप भी ये चाहते हो कि
मार मार के ठोकरे जमाना
कर दे कठोर मुझे इतना कि
लगाकर भभूति, जमकर धूनी
मै भी आपकी तरह मस्त हो जाऊ
शायद चाहते हो आप कि
दिखाए जमाना बेरुखी मुझे इतनी कि
मोड़कर मुहं अपना जमाने से
सदा के लिए आप कि
शरण में मै चला आऊं
शायद चाहते हो आप कि
खाऊँ मै जमाने से धोखें इतने कि
सिवा आपके मै दुनिया में
किसी और पर कभी
विश्वास न कर पाऊँ
सच है प्रभु कि आप ही पहला
और आप ही हो आखरी सच
आप ही हो सुंदर सबसे
और आप ही हो शिव
है आप से ये विनती मेरी कि
विश्वास मेरा यूँ ही बनाये रखना
और मुझे अपने चरणों
से लगाये रखना II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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