अन्धकार
बाहर के अंधे पर क्यों तरस खाता है
पहले अंदर के अंधकार को क्यों नही मिटाता है
बाहर का अँधा तो है मजबूर कि नही दिखाई देता उसको
पर तूं तो देखकर भी सबकुछ फिर भी आँखें मूंदे जाता है
इस पंच भूत के शरीर पर
तो तूं नही करता बर्दाश्त
एक कण भी धूल का
मगर इस आत्मा पर लिपटे इस मैले शरीर पर
तूं क्यों बेतहाशा मुग्ध हुआ जाता है
खुली आँख से तो दीखता है कुछ दूर तक
कुछ अच्छा है कुछ बुरा यह संसार है
मूँद ले आँख और कर ध्यान उस मालिक का
अंदर तेरे छुपा एक पूरा नेसर्गिक ब्रह्मांड है
देख लेगा जो अंदर का संसार एक बार
नही आएगा कभी तरस तुझे
उन बिना आँख के अंधे के अंधकार पर
आयेगा तुझे तरस उन आँखों वालो के
अंदर फैले उस अंधकार पर II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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