दीवार
जानता जो इतना कि तुम चाहती हो माया को इतना
तो शायद तुम्हे मै कभी न चाहता
चाहता जो मै भी पैसे को तो
शायद तुम्हे कभी भी न अपनाता
हो सकता है कि अपनाना तुम्हे मेरी नादानी थी
हो सकता है कि बननी यूँ ही
मेरी बर्बादी कि कहानी थी
हो सकता है कि यूँ ही मेरी
विकृत तस्वीर जमाने को तुमने दिखानी थी
पर क्या तुम हमेशा के लिए
सच्चाई को छुपा पाओगी
मानता हूँ स्वार्थी है जमाना
पर क्या हमेशा तुम
जमाने के स्वार्थो कि पूर्ति कर पाओगी
पर जानती हो कि
क्या हो सकता है अंजाम इसका
कि एक डोर है उन बीते पलो कि
उड़ रही है सहारे जिसके
पतंग जिन्दगी कि
मगर अब यह डोर भी
हाथ से निकली जा रही है
और ये बेरुखी आपस में
जो आ गयी है बीच में हमारे
अब नफरत कि दीवार सी बनती जा रही है
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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