Thursday, August 19, 2010

MANV SRISHTI

मानव सृष्टि
दुनिया के मेले में हम भटक गए है
अपने जनक से हम बिछड़ गए है
चारो तरफ है शोर अजनबी आवाजो का
नही आता समझ की हम कहाँ  गए है

कहीं नामो की आवाज गूँज रही है 
कही रिश्तो की पुकार गूँज रही है 
कोई हालात की दुहाई दे रहा है 
कहीं कहकहो का शोर सुनाई दे रहा है 

सब चिंतित है शरीर के शव को लेकर
क्यों मानव शरीर रुपी शव के ईश को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पुकारता

शिव-शक्ति का भेद न कोई जान पाया है
शिव की शक्ति ने सबको भरमाया है
औरत सिर्फ माँ के रूप  में  छाया है
बाकी  तो  सब माया  है


ये ही तो भगवान कृष्ण  की महामाया है
सारी दुनिया को जिसने नचाया है
बड़ो  बड़ो को जिसने भरमाया   है
सिवा शिव के कोई इसे जान न पाया है

दुःख में हर कोई ऊई माँ तो पुकारता है
पर माँ उमा को क्यों नही बुलाता है
जीना है सही मायनो में तो शिव को जानो
सत्य ही शिव है और शिव ही सत्य है
इस पहले और अंतिम सत्य को पहचानो
ये ही सत्य है और ये ही सुंदर है II

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी

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