मानव सृष्टि
दुनिया के मेले में हम भटक गए है
अपने जनक से हम बिछड़ गए है
चारो तरफ है शोर अजनबी आवाजो का
नही आता समझ की हम कहाँ गए है
कहीं नामो की आवाज गूँज रही है
कही रिश्तो की पुकार गूँज रही है
कोई हालात की दुहाई दे रहा है
कहीं कहकहो का शोर सुनाई दे रहा है
सब चिंतित है शरीर के शव को लेकर
क्यों मानव शरीर रुपी शव के ईश को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पहचानता
क्यों कोई शिव को नही पुकारता
शिव-शक्ति का भेद न कोई जान पाया है
शिव की शक्ति ने सबको भरमाया है
औरत सिर्फ माँ के रूप में छाया है
बाकी तो सब माया है
ये ही तो भगवान कृष्ण की महामाया है
सारी दुनिया को जिसने नचाया है
बड़ो बड़ो को जिसने भरमाया है
सिवा शिव के कोई इसे जान न पाया है
दुःख में हर कोई ऊई माँ तो पुकारता है
पर माँ उमा को क्यों नही बुलाता है
जीना है सही मायनो में तो शिव को जानो
सत्य ही शिव है और शिव ही सत्य है
इस पहले और अंतिम सत्य को पहचानो
ये ही सत्य है और ये ही सुंदर है II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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