जवाब
अंग्रेजो ने तो बिछाई थी कुर्सिया अपनी
भारत वासियों कि लाशो पर
पर आज के नेताओ ने तो
कुर्सियों के नीचे बिछी लाशो को भी बाँट दिया है
कोई हिन्दू कि लाश पर बिछाये बैठा है कुर्सी
किसी कि कुर्सी के नीचे मुसलमान कि लाश पड़ी है
कोई दलितों कि लाश पर बिछा रहा है कुर्सी
तो कोई सवर्णों कि लाश पर गद्दी बिछा रहा है
कैसे कह दे कि ये नेता हमारे नेता है
ये तो हमे आपस में ही भिड़ा रहे है
ये कैसे है हमारे अपने
जो भाई भाई को आपस में लढ़ा रहे है
क्या सोचा है इन्होने कभी कि
ऐसी चलाई है परम्परा इन्होने
कहीं ऐसा न हो कि किसी आने वाली पीढ़ी में
किसी कुर्सी के नीचे इनके
आने वाले किसी वंशज कि लाश पड़ी हो
क्या होगा तब
क्या इनकी आत्मा इनको कभी माफ़ कर पाएंगी
तब क्या होगी हालत उसकी और
वो अपने रब को क्या जवाब दे पाएंगी II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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