सच्चा रिश्ता
पहले मै रिश्तो के लिए जीता था
अब मै सिर्फ रिश्ते निभाता हूँ
पहले मै लोगो को अपना बनाता था
अब सिर्फ रिश्तेदार बनाता हूँ,
जब तक नही था जानता
असलियत इन रिश्तो की
तब तक मेरे जीवन से भी ज्यादा थी
अहमियत इन रिश्तो की
आ गयी अब जब
असलियत सामने इन रिश्तो की
अब और इन रिश्तो की
गहराई में नही डूबना चाहता हूँ
रिश्तो के हर रस में होता है
छुपा जहर कुछ ना कुछ मतलब का
लेकर प्रेरणा भगवान नीलकंठ से
इस जहर को गले तक ही निगलना चाहता हूँ
किसी से बनता है रिश्ता क्योंकि वो धनवान है
किसी से बनता है रिश्ता क्योंकि वो बलवान है
कही निभाता है आदमी रिश्ता क्योंकि बचाना उसे सम्मान है
वरना तो ये रिश्ते जी का जंजाल है
रिश्तो की इस भीड़ में
भूल गए हम एक रिश्ता
की पहले तो है हम में रिश्ता
की हम सब इन्सान है
है असली रिश्ता वही जिसमे हो भरा रस इतना
की ले जाये हमे वो हमारे ईश की और
ऐसा रिश्ता किसी शब्द किसी नाम का
कभी भी मोहताज नही होता,
चाहे हो वो कृष्ण गोपियों का
या वो हो राम भीलनी का
वो किसी और चीज का नही
बस श्रदा और प्रेम का गुलाम होता है II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
No comments:
Post a Comment