Friday, October 15, 2010

अँधेरी नगरी ......

अँधेरी नगरी ......

वक़्त ने कभी मेरा साथ नही दिया
चाहा जब की रुक जाये वक़्त
यंही बन्द घड़ी की तरह
मगर समय फिसल गया हाथ से
बनके समुन्द्र की रेत की तरह  I
और जब चाहा मैंने  कि
निकल जाये वक़्त आंधी कि तरह
तब खड़ा रह गया समय और
बरस गया वो बनके 
घनघोर सावन के बादल कि तरह  I

कहते है कि वक़्त बड़ा बेईमान होता है
मगर वो आ जाये साथ तो गधा भी पहलवान होता है I
मगर वो सारी बेईमानी हमारे साथ ही करता रहा
वो शायद नाराज था मेरी समझदारी से
इसलिए गधो को पहलवान करता रहा
और धरकर रूप तरह तरह के सदा मुझे छलता रहा  I

दू दोष मै किसको अपनी नादानी को जो
अपना न सका चलकर साथ समय के बढती हुई  बेईमानी को
या फिर दू दोष अपनी उस सोच सुहानी को
न समझ सका जो मखौटे मै छुपी
दुनिया के स्वार्थ की कहानी को  I
था तकाजा यही वक़्त का कि कलपुर्जो का है ये युग
आदमी नही कलपुर्जो का व्यापारी बन जा
न समझ कोई जीवन किसी मे ये सब तो संज्ञा शून्य है  
चला इनको जैसे तैसे और इनसे सिर्फ अपना मुनाफा कमा I

करके कोशिश सफाई की इन कलपुर्जो की
जो की है गलती तूने उसका हर्जाना तो देना होगा
कटवाकर हाथ अपने
उन मासूम गुनाहों का जुरमाना तो तुझे भरना होगा  I
अब भी वक़्त है कि इस जालिम दुनिया से
जितनी जल्दी हो दूर उड़ जाऊ
नही देखता कोई पाप या पुण्य को यहाँ
क्यों करके पाप मै यहाँ झूठी इज्जत कमाऊ I 
है यह अँधेरी नगरी और यंहा का है चौपट राजा
मिलता है यंहा टके सेर भाजी और टके सेर खाजा  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी   

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