मिलन
अब है ये कामना की
अब कभी कोई कामना न हो
अब न हो किसी कामयाबी की चाहत ताकि
फिर से कभी नाकामयाबी का सामना न हो
कुछ पा लेने की तमन्ना ही
होती है मूल कारण कामना का
न हो कुछ खो जाने का डर इसलिए
कुछ पा लेने की ही भावना न हो
भावना ही है कामना की जननी
अहंकार ही है जनक भावना का
अहंकार बनाता है माध्यम मन को इसीलिए
हूँ चाहता की मन में पैदा ही कोई भावना न हो
ज्ञानेन्द्रिया देती है सूचना मन को
मन देता है आज्ञा कर्मेन्द्रियो को
छोडकर बुद्धि को हो अहंकार का कब्जा मन पर
ऐसी परस्थिति का कभी सामना न हो
मूल में बुद्धि के है सत्ता आत्मा की
अहंकार का है कारण भटकाव इन्द्रियों का
हो मन वश में बुद्धि के
अहंकार की कभी भावना न हो
बुद्धि की बताई राह पर
जब मन चला जायेगा
इन्द्रियों को तब करके वश में
अंदर की तरफ मोड़ ले जायेगा
करके महसूस अंदर के आनन्द को
इन्द्रियों का भटकाव खत्म हो जायेगा
इसी राह के अंत में आत्मा का
परमात्मा से मिलन हो जायेगा II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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