Thursday, October 14, 2010

आराम

    आराम

मन में जब पैदा होता है अहंकार
अहंकार से पैदा होता है अधिकार
किसी पर अधिकार का होना ही
है आसक्ति उसके प्रति
किसी पर आसक्ति के अधिकार कि कामना
ही है अहंकार की  जनक,
कामना में छिपा है विकार
उस विकार को जानना ही ज्ञान है
ज्ञान से उत्पन्न होता है वैराग्य
और वैराग्य का होना ही कामना का नाश होता है
जब कामना नही होती तो विकार नही होता
और विकार का न होना ही बडाता है ज्ञान को
और ज्ञान बडाता है वैराग्य को और फिर
वैराग्य बडाता है ज्ञान को और दोनों एक दुसरे को बड़ाते है
वैराग्य ही ज्ञान है और ज्ञान ही वैराग्य है
इसको पाना ही इन्सान का सौभाग्य है
बाकी सब तो उसका दुर्भाग्य है

राजा का तो होता है अधिकार सिर्फ एक सीमा में
वैरागी का तो पूरे संसार पर सम्राज्य है
नही झुकाया जब शीश एक वैरागी ने सामने सम्राट सिकंदर के
तो पूछा उससे सिकंदर महान ने कि
क्यों की ऐसी नादानी उस नादान ने
बोला वो वैरागी कि अगर मै सजदे में शीश झुकाऊंगा
तो बताओ बदले में उसके मै क्या पाउँगा
कहा सम्राट ने कि अगर तू सजदे में सिर झुकाएगा
तो भर दूंगा झोली तेरी इतनी दौलत पायेगा
हंसकर बोला वैरागी बता उससे क्या हो जाएगा
बोला सिकंदर कि लगाकर उस दौलत को व्यापार में
तो और दौलत कमाएगा और फिर
लेकर उस दौलत को बैठकर खूब  आराम फरमाएगा 
एक बार फिर हंसा वैरागी और कहा ऐ सम्राट
तू क्यों चाहता है कि मै अपना मन भटका लू
और मोह माया में फिर से खुद को फंसा लू
नही रखता मै कुछ भी बचाकर इसलिए
नही है चिंता मुझे कुछ खो जाने की
है नही साथ मेरे कुछ सिवा मेरे ज्ञान के
तो नही है फ़िक्र मुझे कुछ बचाने की
जहाँ जहाँ जब जब चाहता हूँ वहां वहां मै जाता हूँ
जहाँ जब जैसे चाहूँ वहां वैसे आराम फरमाता हूँ
है राज यही मेरी बेफिक्री का
जिसपर मै इतना इतराता हूँ
शायद इसीलिए सामने किसी सम्राट के नही
बस उपरवाले के सामने  ही शीश नवाता हूँ
हुआ शर्मिंदा और बोला यह सम्राट कि
सुनने ले सभी जनता मेरी ये बात
कि बाद मरने के रखना कफन के बाहर मेरे हाथ
ताकि जमाना भी ये देखे कि सिकन्दर भी
मरने के बाद कुछ नही ले गया साथ

इसलिए जीत इन्सान कि नही है
भोग विलास में बल्कि वैराग्य में है
आसक्ति भोग विलास में मानव का
सौभाग्य नही है बल्कि दुर्भाग्य है
जीते है निर्लिप्त होकर अपना जीवन
इस जग में  ये  योगी लोग
दुःख हो या सुख हो है मानते उसे
वो अपने संचित कर्मो का भोग II

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी   


        

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