Wednesday, October 13, 2010

भीख

भीख

कुछ लोग चाहते है कि
झुठला कर मेरे दर्द को
वो मुझे नीचा दिखाए
पर कहता हूँ मै कि
पहले वो मेरे जितने जख्म तो खाए
नही मुश्किल है निकलना
आह का मुख से
पर मजा तब है जब
आह दिल के अंदर से आये
माना कि लिख सकता है कोई भी
पर है लिखना वो ही जो
लेखन को आप बीती सा लिख पाए

अपनी नजर से जो देखा वो ही संसार है
जो दुसरो ने समझाया वो सब बेकार है
जलाना चाहते हो जो दुनिया को
तो पहले खुद जलना सीखो
तुम क्या मिटाओगे किसी को
पहले खुद तो मिटना सीखो

क्यों ढूंढते हो कंधा किसीका
रखने को बंदूक अपनी
पहले करके कंधा मजबूत अपना
उसपर बंदूक तो ढंग से रखना सीखो
जब तक ढूंढते रहोगे कंधे दूसरो के
कभी बंदूक चलाना नही सीख पाओगे 
नही पाओगे अधिकार कभी
जब भी पाओगे भीख पाओगे  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी

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