सृष्टि
है कहलाता आज का युग कलयुग क्योंकि
नही जीता आज का मानव आज के लिए
वो तो हर रोज़ हरदम आने वाले कल के लिए मरता है
था जब सतयुग तब जीता था इन्सान सिर्फ सच के लिए
चाहे वो सच बीते हुए कल में, आज में
या फिर वो आने वाले कल में होता था
फिर आया त्रेता युग
अब मानव तीनो काल की सोचता था
मगर फिर भी मर्यादाये धर्म की वो नही खोता था
जब आया द्वापर युग तब का मानव
बीते कल की छोड़ सिर्फ आज की फ़िक्र कर रोता था मगर
आने वाले कल के लिए अपने आज को वो भी नही खोता था
अब आया है कलयुग, सोचता है मानव कि
कल तो किसी तरह बीत गया है, आज भी गुजर ही रहा है,
मगर क्या होगा कल को ये ही सोचकर वो उलझ रहा है
वैसे भी है ये कल पुरजो का युग
जहाँ इन्सान भी मशीन बन जाता है
इसलिए भी ये कलयुग कहलाता है
कहता है कोई कि है घर घर में कल- कल
इसलिए ये कलयुग कहलाता है और करने को
यह कलह दूर कलयुग में भगवान का कल्कि अवतार कहलाता है
कल हो या आज हो या फिर कल हो
ये दुनिया सत्य को मिटा नही पायेगी और
सत्य से शुरू हुई यह सृष्टि
और अंत में शिव में ही समा जाएगी II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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