Friday, October 15, 2010

एक औंकार

एक औंकार
सोचते है हम कि
ये ऐसे न होते
तो वो वैसे न होते
न ये ऐसे होते तो न वो वैसे होते
तो शायद   मै भी ऐसा न होता

इन्होने ये न किया होता
तो शायद वो ऐसा न करता
हो सकता है कि फिर मै भी ऐसा न होता
ये और वो के चक्रव्यूह में फंसे
हम आज के इन्सान इतना उलझ गये है
कि मै कौन हूँ ये भी शायद भूल गये है

ये कौन है और वो कौन है
जो आज ये है वो कल वो थे
जो कल वो थे वो आज ये है
अगर ये न होते ये तो वो न होते वो
तो न ये होते, न वो होते और न मै ही मै होता
और तभी हम सब शायद हो पाते  एक औंकार  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी    

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