Friday, October 15, 2010

एक तथा शून्य

एक तथा शून्य

क्यों चाहते हो कि खो जाये मेरा सुब कुछ
क्यों चाहते हो कि हो जाऊ में मोहताज
क्यों चाहते हो बन जाओ बड़ा इस तरह
क्यों चाहते हो करना छोटा मुझे इस तरह
हो सकता है छीन लो तुम सब कुछ मुझसे
हो सकता है इस तरह
हो जाये तुम्हारे  अहंकार कि तुष्टि
पर करके ऐसा क्या मुझको मेरी नजर मुझे छोटा या
खुद को खुद कि नजर में बड़ा साबित कर पायोगे I
क्यों हरदम बिछाना चाहते हो कांटे राहों में मेरी
करके ऐसा सिर्फ मेरे पैर नही बल्कि
मेरी आत्मा को लहू लुहान कर जायोगे I
मैंने तो चाहा हरदम कि हो सुगम राहे तेरी
की हरदम कोशिश कि बड़कर थाम लो बांह
अगर तुम कभी लड़ खड़ा जाओ कंही
पर अड़ाकर टांग राहों में मेरी
क्या तुम कभी मुझे मेरी नजर में मुझे गिरा पायोगे I
जब सोचोगे बाद मेरे अपने व्यवहार को
तब आइने में खुद को क्या जवाब दे पायोगे I
जानते हो तुम की सब समझता हूँ मैं
पर जानकर भी कुछ बोल नही पाता हूँ मै
उठा लो बेशक फायेदा खूब मजबूरी का मेरी 
पर करके ये सब क्या तुम खुश रह पायोगे  I
हो जाये एकत्रित शून्य चाहे जितने भी
पर है मूल्य उन शून्यो का तभी तक
लगा हुआ आगे उनके एक जब तक
जाते ही एक के तुम सब शून्य हो
और शून्य ही रह जायोगे II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी         

No comments:

Post a Comment