एक तथा शून्य
क्यों चाहते हो कि खो जाये मेरा सुब कुछ
क्यों चाहते हो कि हो जाऊ में मोहताज
क्यों चाहते हो बन जाओ बड़ा इस तरह
क्यों चाहते हो करना छोटा मुझे इस तरह
हो सकता है छीन लो तुम सब कुछ मुझसे
हो सकता है इस तरह
हो जाये तुम्हारे अहंकार कि तुष्टि
पर करके ऐसा क्या मुझको मेरी नजर मुझे छोटा या
खुद को खुद कि नजर में बड़ा साबित कर पायोगे I
क्यों हरदम बिछाना चाहते हो कांटे राहों में मेरी
करके ऐसा सिर्फ मेरे पैर नही बल्कि
मेरी आत्मा को लहू लुहान कर जायोगे I
मैंने तो चाहा हरदम कि हो सुगम राहे तेरी
की हरदम कोशिश कि बड़कर थाम लो बांह
अगर तुम कभी लड़ खड़ा जाओ कंही
पर अड़ाकर टांग राहों में मेरी
क्या तुम कभी मुझे मेरी नजर में मुझे गिरा पायोगे I
जब सोचोगे बाद मेरे अपने व्यवहार को
तब आइने में खुद को क्या जवाब दे पायोगे I
जानते हो तुम की सब समझता हूँ मैं
पर जानकर भी कुछ बोल नही पाता हूँ मै
उठा लो बेशक फायेदा खूब मजबूरी का मेरी
पर करके ये सब क्या तुम खुश रह पायोगे I
हो जाये एकत्रित शून्य चाहे जितने भी
पर है मूल्य उन शून्यो का तभी तक
लगा हुआ आगे उनके एक जब तक
जाते ही एक के तुम सब शून्य हो
और शून्य ही रह जायोगे II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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