अंत
तुमने करके मुझे अलग थलग जमाने से
जो किया चतुराई नही की
नही सोचा तुमने कि जब मै रहूँगा सबसे अलग
तो तुम्हारे पास भी कौन आएगा
करवाकर बर्बाद मुझे दुनिया से
तुमने कोई समझदारी ;नही की
नही सोचा तुमने कि हुआ मै बर्बाद तो
अपनी जीत का जश्न तुम कैसे बनाओगे
बनवाकर असहाय मुझे
तुमने कोई बहादुरी नही की
नही सोचा तुमने की हुआ अगर असहाय मै
तो मजबूत तुम भी कैसे रह पाओगे
मै देखता रहा बर्बादी अपनी
बना हुआ असहाय और पंगु
और नही किया अगर प्रतिकार तो भावना
तुम्हे दुनिया के वारो से बचाने कि थी
है वो बात दीगर
कि बात मै ये समझा बाद में
कि नही थी कोई और बात बस
बात तो मुझे झुकाने की थी
मगर हो नीयत ठीक तो
ईश्वर जो करता है वो अच्छा ही करता है
हुआ जब मै अलग थलग तो
उतरा अपनेपन का नकाब हर चेहरे से
जाना मैंने की
नही है दुनिया में कोई अपना
पाते ही मौका हर कोई
एक दूजे की भावनाओ से खिलवाड़ करता है
लुटा जब और छुटा भोग विलास दुनिया का
तब हुआ ये एहसास कि
भोग के लिए किया गया कर्म
आखिर में दुःख का सबब बनता है
पिछले कर्मो कि वजह से
नही मिलता जब सुख
करके कर्म सुख के भोग के लिए
तब इन्सान बड़ा दुखी होता है
और अगर किस्मत से
कहीं मिल जाये उसे सुख
तो भी उसके खोने के डर से
वो सदा दुखी रहता है
क्या करनी कामना ऐसे सुखो की
जो हमेशा रखे दुखी इन्सान को
येही सोच कर अब मेरा हर कर्म
बिना किसी फल की आशा के होता है
अब रहती है येही सोच मन मे
कि कर्तव्य समझकर
किये किसी कर्म का
कभी भी कोई फल नही होता है
अब मै जिस राह पर हूँ चल पड़ा उस राह पर
कोई आज नही कोई बीता कल नही और
कोई आने वाला कल नही, क्योंकि उस राह पर
कर्मो का व्यपार नही होता है
आ रहा है वो वक्त जल्दी जब ये
दुनिया का अस्तित्व दूर क्षितिज में बिन्दुओ सा
बिखर जायेगा और तुम्हारे हमारे रिश्ते का होगा
वो ही हश्र जो ऐसे रिश्ते का होता है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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