ऐसा क्यों ?
आज जब मै हूँ पास तुम्हारे
तुम मुझे जानकर भी नही चाहते जानना
क्योंकि लगता है तुम्हे कि
मै ऐसा कैसे हो सकता हूँ
आज जब हूँ मै साथ तुम्हारे
तब चलकर भी तुम साथ हमारे
नही कर पाते विश्वास कि
ऐसा कैसे हो सकता है
मगर हूँ सोचता मै कि
चला जाऊ मै दूर इतना कि
मेरे पास होने का एहसास
भी तुमसे दूर हो जाये
सोचता हूँ कि छोडकर साथ तुम्हारा
कर लू रास्ता अलग अपना ताकि
मेरे साथ होने का एहसास
भी तुमसे दूर हो जाये
हो सकता है अगर चला गया दूर तुमसे
हो जायूँगा मै दूर इतना कि
कैसे करती हो महसूस बिन हमारे
यह एहसास भी हम तक पहुँच न पाए
हो सकता है कि
हो जब जरूरत तुमको
और तुम पुकारो हमको तो
तुम्हारी आवाज़ भी हम तक पहुँच ना पाए
हो सकता है कि तब सोचो तुम
कि ऐसा होता तो वैसा नही होता
और कभी सोचो कि वैसा होता
तो फिर कभी ऐसा न होता
इस ऐसे वैसे कि सोच में
कभी कभी ऐसा कुछ हो जाता है
कि सोचता रहता है इन्सान कि
ऐसा क्यों हो जाता है ई
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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