गलतफहमी
आ खड़ा हुआ हूँ आज उस मुकाम पर
जहाँ जिन्दगी एक मजाक लगती है
नही रही कोई चाहत अब जिन्दगी में
अब तो मौत ही छुटकारे का आगाज़ लगती है
नचा रही है दुनिया बनाकर कठपुतली
अपने गन्दे हाथो में फिर भी
जब दिखाता है चमक कोई झूठी ख़ुशी की
तो उसकी हरकत और भी बेजार लगती है
गोल घूम रही है दुनिया
गोल रूपए के आस पास
न कोई दोस्त, न हमदर्द न रिश्तेदार अब तो
स्वार्थ से भरी हमदर्दी दुनिया की
बकवास नजर आती है
बहलाना चाहते हो मुझे दिखाकर
झुनझुना भोग विलास और उम्मीदों का
मगर जानता हूँ मै की बाशिंदे हो
जिस बस्ती के तुम वो बस्ती तो मुझे
स्वार्थो की बदनाम बस्ती नजर आती है
किसको कहूं मै अच्छा और किसको कहूं मै बुरा
कौन सुनता है और कौन करता है परवाह मेरी
जब आती है बात तुम्हारे स्वार्थ की तब
मेरी भावनाए तो उसके सामने बेकार नजर आती है
आखिर कब तक रहोगे करते जुल्मो सितम मुझपर
आखिर कब तक रहोगे कुचलते भावनाओ को मेरी
आखिर कब तक रहोगे समझाते खुदको की
नही किया कुछ भी तुमने गलत मेरे साथ
तुम्हारी हरकते तो उपरवाले को भी बेजार कर जाती है
हो सकता है की बांध दो तुम
आँख पर समाज के स्वार्थ की पट्टी मगर
उपरवाला आँख से नही आत्मा से देखता है
और आत्मा के प्रकाश पर कोई पट्टी नही बंधती
उसे अपने प्रकाश में हर चीज़ साफ़ नजर आती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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