अंतिम विदाई
जब नही पूछता कोई मुझे
तो उससे मै खुश हो जाता हूँ
जाने अनजाने उसके
दायित्व से मै मुक्त हो जाता हूँ
जीवन है लेखा जोखा कर्मो का
अच्छे बुरे कर्म मनुष्य के साथ चलते है
नही छुटकारा इस कर्म बंधन से किसी का
कर्म तो भोगने से ही कटते है
बनता है कोई रिश्ता
परनीति में हमारे पूर्व जन्मो के कर्मो की
जब ठुकराता है कोई तो उसके
उन जन्मो के बन्धनों से छूट जाता हूँ
लगता है कभी कभी की भटकता हुआ आ गया
नही था मेरा जन्मो का रिश्ता इन सबसे
क्योंकि अपने इर्द गिर्द फैले इन रिश्तो की कड़ीयो में
खुद को मै एक अजनबी सा पाता हूँ
कोई भी मुझसे जुड़ा नही महसूस करता
मै भी किसीसे जुड़ा महसूस नही करता
भोगने को पूर्व कर्मो को जुड़ गया इस कड़ी में
वरना मै खुद को इस दुनिया में फिट कहाँ पाता हूँ
इसलिए छोडकर बस एक रिश्ते को
तोड़ता है जब कोई रिश्ता मुझसे
तो करने के लिए आजाद एक और बंधन से
मै उपर वाले का शुक्र मनाता हूँ
है वो एक रिश्ता पिता पुत्र का
है लालसा ये ही की और कुछ मिला या नही मिला
पर चढ़कर अपने पुत्र के कंधे पर
इस दुनिया से अपनी अंतिम विदाई चाहता हूँ II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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