Saturday, September 25, 2010

अंतिम विदाई

अंतिम विदाई

जब नही पूछता कोई मुझे
तो उससे मै खुश हो जाता हूँ
जाने अनजाने उसके
 दायित्व से मै मुक्त हो जाता हूँ

जीवन है लेखा जोखा कर्मो का
अच्छे बुरे कर्म मनुष्य के साथ चलते है
नही छुटकारा इस कर्म बंधन से किसी का
कर्म तो भोगने से ही कटते है

बनता है कोई रिश्ता
परनीति में हमारे पूर्व जन्मो के कर्मो की
जब ठुकराता है कोई तो उसके
उन  जन्मो के बन्धनों से छूट जाता हूँ

लगता है कभी कभी की भटकता हुआ आ गया
नही था मेरा जन्मो  का रिश्ता इन सबसे
क्योंकि अपने इर्द गिर्द फैले इन रिश्तो की कड़ीयो में
खुद को मै एक  अजनबी सा पाता हूँ

कोई भी मुझसे जुड़ा नही महसूस करता
मै भी किसीसे जुड़ा महसूस नही करता
भोगने को पूर्व कर्मो को जुड़ गया इस कड़ी में
वरना मै खुद को इस दुनिया में फिट कहाँ पाता हूँ

इसलिए छोडकर बस एक रिश्ते को
तोड़ता है जब कोई रिश्ता मुझसे
तो करने के लिए आजाद एक और बंधन से
मै उपर वाले का शुक्र मनाता हूँ

है वो एक रिश्ता पिता पुत्र का
है लालसा ये ही की और कुछ मिला या नही मिला
 पर चढ़कर  अपने पुत्र के कंधे पर
इस दुनिया से अपनी अंतिम विदाई चाहता हूँ  II

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी  

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