Sunday, September 26, 2010

सदगति

सदगति

नही किया प्रतिकार अगर हमने तुम्हारा
तो इसे तुम मेरा समर्पण मत समझो
क्योंकि शांति भी कई बार
किसी आने वाले तूफ़ान का संकेत होती है

नही होती हमेशा शांति
स्वीकारोक्ति किसी बात की  
कभी कभी ख़ामोशी भी  
किसी अत्याचार का विरोध होती है

जरूरी नही की बोलकर
निकाला जाये गुस्सा अपना
कभी कभी दिमाग में 
गुस्सा बिठाने की भी जरूरत होती है 

तुमने हमेशा समुन्द्र से 
उड़ते देखा है जल को भाप बनकर 
पर इसका नही एहसास तुम्हे 
की उपर से कितनी आग बरसती है 

पर्वत से उठते धुंए को मत समझो
अंगीठी का धुआ, नही पता तुम्हे
की ज्वालामुखी में कितनी आग होती है और
फटते है ज्वालामुखी जब तो  हर तरफ विनाश लीला होती है

मन को अहंकार से नही बुद्धि से चलाओ
अहंकार से चलने वाले की बहुत दुर्गति होती है
हो सकता है ढाहकर जुल्म हो जाये तुष्टि तुम्हारे अहंकार की 
मगर सदगति अहंकार से नही ज्ञान से होती है II 

लेखक  प्रवीन चन्द्र झांझी

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