सदगति
नही किया प्रतिकार अगर हमने तुम्हारा
तो इसे तुम मेरा समर्पण मत समझो
क्योंकि शांति भी कई बार
किसी आने वाले तूफ़ान का संकेत होती है
नही होती हमेशा शांति
स्वीकारोक्ति किसी बात की
कभी कभी ख़ामोशी भी
किसी अत्याचार का विरोध होती है
जरूरी नही की बोलकर
निकाला जाये गुस्सा अपना
कभी कभी दिमाग में
गुस्सा बिठाने की भी जरूरत होती है
तुमने हमेशा समुन्द्र से
उड़ते देखा है जल को भाप बनकर
पर इसका नही एहसास तुम्हे
की उपर से कितनी आग बरसती है
पर्वत से उठते धुंए को मत समझो
अंगीठी का धुआ, नही पता तुम्हे
की ज्वालामुखी में कितनी आग होती है और
फटते है ज्वालामुखी जब तो हर तरफ विनाश लीला होती है
मन को अहंकार से नही बुद्धि से चलाओ
अहंकार से चलने वाले की बहुत दुर्गति होती है
हो सकता है ढाहकर जुल्म हो जाये तुष्टि तुम्हारे अहंकार की
मगर सदगति अहंकार से नही ज्ञान से होती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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