सृष्टि
क्या वाकई उन्नत हुआ मानव
क्या उन्नति का मतलब
बजाय चार पैर के दो पैर पर चलकर
जानवर से महज मानव बनना ही है
रचना की थी उसने समाज की
बनाया था आधार उसने
अपने उस समाज का
प्यार, सहयोग और भाई चारे को
चलाने को समाज उसने बनाये
कुछ नियम और नियमो को
मानने के थे कुछ बंधन जो थे अपनाये उसने
ख़ुशी से खुद को आगे बड़ाने को
मगर ज्यों-ज्यों उन्नति करके
आज आ पहुँचा उस मुकाम पर
जहाँ आज वो ही नियम बंधन
लगते है अपनी प्रगति में बाधा उस को
तोड़ने की चाहत इन बन्धनों को
जा पहुंची है उस मुकाम पर
उफनती है भावनाए उसकी
समझता है बेफाल्तू इन नियमो को
चाहता है उड़ना अकेला पंछी सा
नही चाहता वो की बंधन हो ऊंचाई का
नही चाहता वो बंधन लौटने का
किसी घोंसले में भी साँझ को
रिश्तो में छुपा प्यार तो हो चुका है खत्म
लगते है बोझ ये रिश्ते उसको
है चाहता बेचना वो इन रिश्तो को
अपने स्वार्थ की किसी दुकान पर
है पाशविक उसकी सोच इतनी की
नही मानता वो स्त्री पुरुष के सनातन रिश्ते को भी
लगता है चलकर वो इस राह पर
ले जायेगा इस सृष्टि को विनाश के कगार पर II
लेखक: प्रवीन चंदर झांझी
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