आखिर
होते ही पैदा शुरू हो गया
तमाशा दुनिया का
घेरकर मुझे हर कोई,
मेरी शकल अपने से मिलाने लगा
जब पिता के तरफ वालो ने मिलाई शक्ल अपनी तो
माँ की तरफ वालो ने मुह बना लिया
और जब माँ की तरफ वाले शक्ल अपनी मिलाने लगे
तो पिता की तरफ वाला हर कोई मुह बनाने लगा
फिर कुछ हुआ बड़ा तो
दिखाकर खिलौने मुझे ललचाया जाने लगा
दिखाकर प्लास्टिक के घोड़े
मुझे असली से भरमाया जाने लगा
फिर कुछ और बड़ा हुआ
और स्कूल कालेज जाने लगा
देकर उदहारण बड़े बड़े
सिदान्तो का पाठ मुझे पढ़ाया जाने लगा
मान के बात दुनिया की जब उतारने लगा
उन सिदान्तो को जीवन में अपने
तो भटकाने को मुझे उन सिदान्तो से
दुनियादारी का पाठ मुझे पढ़ाया जाने लगा
जब नौकरी की ईमानदारी से
और उठाई आवाज़ जुल्म के खिलाफ
तो निकम्मा और आदर्शवादी का
ताना मुझे सुनाया जाने लगा
देखकर मुझे सरल और भावुक
खूब फायदा उठाया दुनिया ने
चाहे थे वो बेगाने या थे वो अपने
भावनाओ में बहाकर खूब उल्लू मुझे बनाया जाने लगा
किसी ने दोस्त बनकर गद्दारी की
किसी ने व्यापार में भागीदार बनकर बेईमानी की
औए कोई बनकर रिश्तेदार करके बुराई
अपनी दिल की जलन मिटाने लगा
हें ईश्वर शुक्र है तुम्हारा की आपने
पकडकर बाह मेरी मुझे रौशनी दिखाई
और उसमे मुझे दुनिया का
असली बदसूरत चेहरा साफ़ नजर आने लगा
ऐ दुनिया वालो अब बख्शो मुझको और
मत दिखाओ ये झुन झुने
झूठी तरक्की और भोग विलास के ,
करके याद बातें तुम्हारी मेरी आत्मा रोती है
नही करनी मुहब्बत मुझे इस दुनिया से
न मुझे अब किसी से कोई नफरत बाकि है
अब तो बस चाहिये मुझे वो कर्म
जिसकी जरूरत इस दुनिया के पार होती है
जिस किसी ने भी जो छीना मुझसे
वो आखिर में सब रह जायेगा यही
याद रखो दुनिया वालो कि
कफन में नही कोई जेब होती है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी
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